बुधवार, अगस्त 18, 2010

अम्बुजा सीमेंट....इस सीमेंट में जान है


यही कुछ 25- 26 साल ही काटे हैं मैंने
पर इन सालों में ना जाने कितनी बार
मरम्मत की होगी मैंने अपने हाथों से
कभी दिन रात जाग-२ के भट्टी जलाई
कड़ी मेहनत की ईंट पकाई रात भर मैंने
इक इक ईंट चीनी पसीने के मसाले से
बरसातों में भीग भीग तराई की इसकी

पर अपनी तदबीरों की इमारत में मैं
तकदीर का सीमेंट न मिला सकी कभी
जब तब देखो दरारे दरारे दिखती हैं.......

यही कुछ 25- 26 साल ही काटे हैं मैंने
पर इन सालों में ना जाने कितनी बार
मरम्मत की होगी मैंने अपने हाथों से
अपनी इस टूटी फूटी तदबीरी इमारत की
मुश्किल से 2 बरसातें ही काट पाती है
फिर वही हाल जगह-२ पे दरारें- दरारें
काश तकदीर की जगह अम्बुजा सीमेंट
डल सकता मेरी तदबीर की इमारत में
सुना है वो सालों साल चलता है ......
के इस सीमेंट में जान है .....
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