सोमवार, सितंबर 06, 2010

घड़ी की फितरत





           ये घडी चीज़ ही ऎसी ही .........
इसके असूल बड़े पक्के हैं
वक़्त की धड़कन थाम
इकसार चलती रहती है

हमेशा कंजूसी करती है
एक पल जो फुर्सत का दे
सूदखोर बनिए की तरह
उस पल का दुगना दाम लेती है

जी में आया वक़्त को रोक लेगी
जी में आया तो वक़्त भगा लेगी

असल मुर्ख तो हम हैं
कभी कलाई से लगा घूमते हैं
कुछ दीवारों पे सजा रहते हैं
हमारे साथ रह के अब तो
इसकी फितरत भी इंसानों सी हो रही है
इंसान को भी जितनी तवज्जो दो
उतना सर पे चढ़ बैठते हैं

इसका Cell निकल दूं , तब पता चले
पर इंसानों से ये एक बात में अलग है
धड़कन रुके तो सब ख़तम

घडी असूलों की बडी पक्की है
इसकी धड़कन रुक जाये तो
इसकी सांस नही रूकती
वक़्त अपनी चाल बरकरार रखता है
ज्यूँ ही नये cell पड़े नही
फिर वक़्त का हाथ थाम
आगे चल पड़ती है

काश रुके हुए रिश्तों में
Cell पड़ सकते इसी तरह
फिर हम भी नही रुकते
इस वक़्त  की तरह  !

4 टिप्‍पणियां:

क्षितिजा .... ने कहा…

well written ... zoya

venus ने कहा…

Xitija shukriya

संजय भास्कर ने कहा…

गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...

विवेक मिश्र 'ताहिर' ने कहा…

"काश रुके हुए रिश्तों में
Cell पड़ सकते इसी तरह"

ये दो लिनेस तो असली जान है असली नज़्म की. गज़ब का लिखती हैं आप.