गुरुवार, जुलाई 16, 2020

गुरुत्वाकर्षण


कल रात यूँ हुआ, हाथ जा चाँद से टकरा गया,
तुम्हे छूने की चाह में, हाथ झुलस के रह गया। 

दूर जाते - जाते ये तुम कितनी दूर निकल गए !


*
  *  
*
*



मैं पृथ्वी सी घूमती दिन-रात अपनी धुरी पे युगों से, 
तुम चाँद सा दूर मगर फिर भी मुझसे सदा बँधे से। 

क्या तुम्हारे और मेरे बीच भी कोई गुरुत्वाकर्षण है?

   

  ज़ोया****
#ज़ोया

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गुरुवार, जुलाई 02, 2020

'राष्ट्रवादिता'

'राष्ट्रवादिता' 
इक भावना 
'राष्ट् 'के सम्मान की ! 
राष्ट्र के आन-बान की
युगों से जीती आ रही 
उस विधि विधान की !


नाम, जाती, धर्म क्या 
रंग, बोली, भेष क्या 
देश में या हो विदेश में 
राष्ट्र उसी का होता है 
जिसके हृदय में हो बसी 
लौ राष्ट्र के सम्मान की !


कलम हो चाहे हाथ में, 
चाहे हो बंदूक हाथ में,
बीजते तुम खेत हो या 
 तेज़ धार हो खींचते 
सुकर्म जो तुम हो कर रहे 
नींव सींचते हो राष्ट्र की !


भक्त या अंधभक्त कहो,
नाम कोई भी बोल लो, 
वयंग्य चाहे खींच लो 
भौहें जितनी भींच लो 
चुभते तुमको शूल क्यों 
बात की जो हित में राष्ट्र की !


पहलू सारे झाँक लो,
तथ्य  सारे जान  लो,
तर्क तोल - मोल लो,
मस्तिक्ष अपने खोल लो,
तुलना करोगे किस से तुम?
मेरे भारत राष्ट्र की  !


ज़ोया****

मंगलवार, जून 30, 2020

बिन्ना


"चार दिन में इतना ही बिन्न पायी बिन्ना ,गुणवंती नहीं बनी तो देखना, ससुराल जायेगी तो सास कानों में गर्म तेल ढूंस देगी सुना-सुना के ," सर पर हल्की सी चपत लगा अम्मा ने खीज के कहा।  

सात साल की उम्र में ये समझना बड़ा मुश्किल लगता था की बिंन्ने में पलसेटे कैसे डालूं , बालों की चोटी बनाना ही इतना मुश्किल लगता था मुझे , इस झाड़ फूंस से कैसे गूँधूँ ।  पर अम्मा से ये सब कहने की हिम्मत नहीं होती थी सो छोटी छोटी आँखे फाड़-फाड़ कर देखती रहती। 

मगर सास के तानों वाली बात से बहुत डर  लगता था मुझे । सास सच में गर्म तेल डाल देगी कानों में।  सरसों का डालेगी या तिल  का।  "है बाबा जी" तिल  का ना डाले बड़ी बदबू लगती है उसकी मुझे , सरसों का फिर ठीक है, उसकी तो आदत है। नहीं-नहीं  मैं अच्छी से बिन्ना बिंनना सीख लूँगी, तेल नहीं डलवाना मुझे।  

अभी ये सब सोच रही थी अम्मा ने इक और चपत लगाई सर पर, "क्या सोचती रहती है बैठे-बैठे , बिन्ना जल्दी कर पूरा।"  

पूरी रात जाग के बार-बार कोशिश करती और आखिरकार बिन्ना बिन्न ही डाला।  पूरा दिन सर पे उठाये घूमती रही, ऐसी ख़ुशी जाने क्या हासिल कर लिया हो। उसी पे बैठ के खाना खाना, उसी पे बैठ के खेलना।  
अम्मा हँस के बोली -पगलैट कहीं की और फिर गोद में बिठा लिया। सगों से भी सगी लगती थी अम्मा मुझे।  अम्मा के गले लग के मैंने पूछा,"अम्मा! अब तो सास मेरे कानों में गर्म तेल नहीं डालेगी ना ? अब तो मैं गुणवंती हो गयी ना?"
अम्मा ने मेरी कस के बाँधी हुई छोटी-छोटी चोटियों को खोला और प्यार से धीरे-धीरे सर सहलाते हुए बोली, 

" गुणवंता  ना होइऐ, होइए भागवंत ! भागवंत के द्वार पर खड़े रहैं  गुणवंत "

विश्वास कीजिये मुझे उस समय कुछ समझ में नहीं आया।   

मैं फिर आँखें बड़ी कर देखने लगी - ये क्या कह रही है अम्मा।  अम्मा ने सर सहलाना ज़ारी रखा और लम्बी साँस भरते हुए बोली ," लाडो ये सब तो तेरे अपने सुख के लिए है,गुणी  बन। 

मैं ऊपर उचक के अम्मा के कान देखने लगी। 

अरी ! ये क्या कर रही है?

अम्मा तुम्हारे कानों में डाला सास ने गर्म तेल ?

अम्मा ज़ोर  से हँसी और साथ ही आँखों में पानी भी आ गया - "तो तुझे क्या लगता है, मुझे कम क्यों सुनाई देता है?" 

और हँसते हुयी उठ गयी।  

पूरी रात यही सोचती रही, मैं बहुत अच्छी बनुँगी, गुणी, ..ताकि  कोई कान में तेल ना डाले। अम्मा तो इतनी अच्छी है, कितना स्वाद खाना बनाती है, कितनी अच्छी सफाई करती हैं, सब काम! बेचारी अम्मा! तभी इतना ऊँचा सुनाई देता है अम्मा को । 

सोने से पहले हाथ जोड़ के ध्यान किया और मन ही मन प्रार्थना की" है बाबा जी, मेरे कान में कोई तेल ना डाले और गर्म  तिल  का तो कभी भी नहीं। "

बिन्ना बनाने में इतनी दक्ष हो गयी के,रंग बिरंगे धागे गूंध के,कोडियां लगा के, घुँघरू लगा के तरह-तरह से सजा लेती। हर शादी बयाह में हर दुल्हन को बिन्ना बना के भेंट करती। 

बिन्ने के साथसाथ हर कार्य में भी, घर का, बाहर का, सिलाई, कढ़ाई,पढ़ाई सब। जब सब के मुँह से मेरे लिए कही अच्छी बातें कानों में जातीं तो बहुत ख़ुशी होती।

आगे की पढ़ाई करने के लिए जब गाँव छोड़ा तो अम्मा ने हँस के कहा,"गर्म तेल के डर से बिन्ना तो छोड़ हर काम में गुणी बन गयी लाडो!"

"हाँ अम्मा! तुमने अनजाने में ही सीखा दिया हर काम में अच्छा होना, हर काम अच्छे से करना !"

"बस कर रहने दे, गर्म तेल ना कान में जाए इसीलिए सीख गयी सब" अम्मा की बात सुन  आस पास के सब हंस पड़े। 

जाते-जाते अम्मा ने वो बिन्ना, जो जाने कब से संभाल के रखा था(जो मुझे भूल भी चूका था) थमा दिया, कहा कुछ नहीं। 

एक के बाद एक कक्षा में आगे बढ़ती गयी, पी.एच.डी डिग्री, महाविद्यालय में लेक्चरर, साथ-साथ शोधकार्य, बयाह, गृहस्ती, बेटा....सब पड़ावों को सम्पूर्णता से जीते-जीते कब ज़िंदगी आगे बड़ती गयी, पता ही नहीं चला। ज़िंदगी का बिन्ना पूरी निष्ठा और स्नेह से बिनंती गयी। पर हर किसी को बुन्तर पसंद,शायद आये ये ज़रूरी नहीं।  

अम्मा से उनकी रुखसती से पहले इक बार मिली तो मेरे बेटे के सर पर हाथ रखते हुए बोली "भागवन्त होइयो" 

झुर्रियों वाले चेहरे पे वो अम्मा की मुस्कान ज़ेहन में सदा के लिए बस गई, जहाँ उनकी हर याद और हर बात बसी हुई है।  

हम्म्म्म.... 

पर अम्मा गुणवंता होना हमारे हाथ में होता है, भागावंत होना नहीं। तुमने गुणवंता होना तो सीखा दिया , भागावंत कैसे होना है ये क्यों नहीं सिखाया। क्यों नहीं बताया की आप चाहे जितना मर्ज़ी गुणवान हो जाओ, रिश्तों में आदर, सत्कार और प्यार मिलना भाग की बात होती है। 

मैंने रिश्तों का हर बिन्ना बहुत निष्ठा, प्रेम और परिश्रम से बुना, लगाव की कोडियां सजायीं, स्नेह और प्रेम के रंग-बिरंगे धागे से इक-इक तिनका जोड़-जोड़ आगे बीना, समर्पण, सत्कार, हर  तरह के घुँघरू लगाए, बहुत प्यार से सहेजा, सब किया। 

मगर मेरे कानों में रह-रह के तेल पड़ता है अम्मा और वो भी गरम तिल का तेल। और अब तो मुझे भी बहुत कम सुनाई देता है अम्मा।  

  ज़ोया****



बिन्ना - पहाड़ी (हिमाचली बोली) में बोला जाता है, सूखी फूस या मक्की के सूखे छल्लों को आगे जोड़-जोड़ कर चोटी की तरह बिना जाता है, और बैठने के काम आता हैं।  


" गुणवंता  ना होइऐ, होइए भागवंत ! भागवंत के द्वार पर खड़े रहैं  गुणवंत "
गुणवान होने से ज़्यदा अच्छे भागों वाला होना अच्छा होता हैं, जिसके भाग अच्छे उसके द्वार पर गुणवान लोग काम करते हैं।  

इक और कहावत भी " रूप चूरे भाग खाये" यानि जो रूपवान हैं, गुणवान है मेहनत कर और चूर-चूर कर के रोटी खोजता है और खाता है जबकि भागों वाला बिना कुछ किये सब पा जाता है। 

सोमवार, जून 29, 2020

अर्धचंद्र !


याद है इक दिन युहीं बैठे-बैठे
मेरी दाहिनी बाज़ू के पीछे 
तुमने इक अर्धचंद्र बनाया था 
सालों हुए 
चाँद तो कबका अस्त हो चूका ! 
पर काली अमावस अब भी 
क्रमबद्ध 
हर पंद्रह दिन बाद आ ही जाती है !

  ज़ोया****

शुक्रवार, जून 26, 2020

सिंपल फ़िज़िक्स !

 

काली सियाह रात के अँधेरे में दूर तक जाती सड़क
सड़क के किनारे-किनारे ऊँचे घने सियाह पेड़
तेज़ हवा के थपेड़ों से जोर शोर से झूमते-घुमड़ते
इक पल को मुझे लगा के वो मुझे कुछ बताना चाहते हों 
जैसे दिनों से इक राज़  हवा ने सीने में दबाया हो
सो ये पेड़ चाहते हो बताना मुझे वो गहरा राज़ 
मैं नज़रे गढ़ा देर तक उन्हें देखती रही,सुनती रही

अभी बातों का कुछ मतलब निकाल ही रही थी के
किसी की इक बात याद हो आई ......

बी प्रैक्टिकल  यार ... इट्ज  सिंपल  फ़िज़िक्स 
(Be Practical yaar,,,,its simple Physics ....)


हाँ .,,सच तो है, ये "सिंपल  फ़िज़िक्स" ही तो है
हाई एंड लो प्रैशर ग्रेडिऐंट  के कारण
हवा बहती है ..और 'लॉ ऑफ़  इनर्शिया' (law of inertia) के कारण ही
ये पेड़ हिलते हैं.
और क्या??.
" इट्ज  सिंपल  फ़िज़िक्स!"

और
अब ये पेड़ मुझसे कुछ नहीं कह रहे
कोई बात नहीं........ कोई राज़ नहीं 
.........काश .......
मुझे ये सिंपल  फ़िज़िक्स
इस वक़्त याद ना आती मुझे 

वो राज़ जो हवा बता के गयी थी इन पेड़ों को 
शायद मैं वो राज़ सुन पाती
किसी से कुछ पल कुछ बोल पाती
किसी से कुछ पल कुछ सुन तो पाती 
आज की रात सकून से कट जाती



  ज़ोया****

मंगलवार, जून 23, 2020

नील-लोहित रंग

 


आँखें यूहं स्थिर हो गयी थी जैसे खुद में समा लेना चाहती हों  इस  दृश्य को।  फ़िरोज़ा रंग  की शाँत ठहरी झील।  मैंने आजतक कभी ऐसा रंग नहीं देखा था पानी का- फ़िरोज़ा, दूधिया- फ़िरोज़ा ।  झील शाँत तो थी मगर किनारों में पानी हलकी हलकी थपेड़े मार के अपने जीवित होने का संकेत दे रहा था।
उसी झील के ऊपर पसरा पड़ा था विशाल फैला आकाश  .... संतरी , नारंगी , गहरा बैंगनी, गहरे गुलाबी रंग लिए आकाश।
धीरे धीरे उस झील की पानी में आकाश मानो खुद को घोलने लगा। इक इक कर के सारे रंग आपस में घुल गए  और इकसार एक बन गए।

अब आकाश सिर्फ इक ही रंग में रंगा था... "नील-लोहित रंग", मेरा पसंदीदा रंग  ( लैवेंडर रंग )। नील-लोहित  - हलके नीले रंग में जैसे कुछ बूंदे लाल बैंगनी रंग की छिड़क दी हों।

महादेव का इक नाम भी तो है "नील-लोहित "। जब महादेव ने विषपान किया, विष और तेज़ ताप से उनका रंग ऐसा पड़ने लगा - नीला रंग लाल बैंगनी छटा लिए और 'नील-लोहित  ' कहाये

हर हर महादेव!
आँखें बंद कर मन में ज़ोर से गूंजा ये स्वर। ....

इसी सोच में सरबोर आकाश की और देखने लगी।नील-लोहित  आकाश ह्रदय में बस घिरता ही जा रहा था, मंत्रमुग्ध कर देने वाला। किसी स्वप्न जैसा। इतना मोहित करता है ये रंग मुझे के बस झपट लूँ और समेट लूँ। और ये तो पूरा का पूरा आकाश ही मेरे पसंदीदा रंग में रंगा है।

मौन ऊँचे पहाड़ों  की नुकीली चोटियां, हल्की हल्की बर्फ  की तेह लिए सफ़ेद  रंग में रंगी मानो आकाश को चूमने का असफल प्रयास कर रही हों। मौन धारण किये वो शांत पहाड़ गंभीरता के साथ इक टक शून्य की ओर  निरन्तर निहारे जा रहे थे।
जहां तहाँ 'अल्पाइन लार्च' के लम्बे-गहरे, हरे पेड़ और उनसे आती वो इक चिरपरिचित महक - आह ! 
चारों और गूंजता सन्नाटा कानों में मन की ताल सुना रहा था। हवा की सिरहन ऐसे के जैसे हर आती-जाती सांस के साथ पूरे जिस्म में इक अजीब सा सकूं भर रही हो। मिट्टी की सौंधी सौंधी सुगँध अलग ही असर कर  रही थी। 

आँखें झपकना भी नहीं चाह रहीं थीं। बस के भरपपुर देख लें इस दृश्य को , समा ले हमेशा के लिए खुद में।  शॉल में  खुद को ज़रा और कस के समेटे बस मैं यहीं बैठे रहना चाहती थी.......  इस नील-लोहित  आकाश तले।

बहुत से कलिक्स लिए , अलग अलग कोण से और अटैचमेंट जोड़ कर भेज दिए।

साथ के साथ ही मैसेज की ट्यून ....

"क्या कर रही हो ?" अपनेपन से भरी , छनकती  हुयी आवाज़  बिना सुने ही महसूस कर रही थी कान में मैसेज पढ़ते पढ़ते।

"तस्वीरें देखीं ! उफ्फ्फ !!! इतनी प्यारी जगह ! "उफ्फफ्फ्फ़  " बहुत ही  सूंदर! सकूं देने वाली , बिना रुके इक साँस  में लिख गयी।

अच्छा कैसी ? भई ! हम तो देख नहीं सकते। अकेले-अकेले मज़े लो। :) :) कैसी दोस्त है हमारी बोलो भला। .हूँ ! अच्छी दोस्ती निभा रही हो !
मैसेज पढ़ते पढ़ते मेरी हंसी निकल गयी, "ड्रामा " और साथ में मुंह बिचकाते हुए का ऐमिकोन।

और बिना सुने ही चार सूँ हंसी बिखर गयी :)

अच्छा बताओ कैसी है  जगह? 

हम्म्म। फ़िरोज़ा रंग की  झील.......  टर्कवाइज़ रंग है  झील के पानी का..फ़िरोज़ा । ..इन पहाड़ों में सल्फर बहुत है  और भी कुछ और केमिकल्स हैं जिनके  कारण इस झील का रंग ऐसा है और
आकाश। ..उफ्फ्फ  .... नील लोहित आकाश...... बहुत ही सुंदर '' टक-टक मैसेज टाइप करते जा रही थी के
अचनाक से कुछ ज़ोर से फ़ोन पे आ लगा, फोन पथरीली ज़मीन पर जा गिरा.. . धपाक !!!!!!!! 

और आँख खुल गयी ................................................

जल्दी से फोन चेक किया  फोन बिलकुल ठीक था .......पर ये तो  वो फोन नहीं था.... वो तो सैमसंग वाला फोन था जो बहुत महीने पहले टूट गया था। 

हम्म्म   :)   इक और सपना ... 

सर झटक के खुद में ही बुदबुदायी....  इक गहरी सांस भर बिस्तर छोड़ उठ खड़ी हुई। 

चाय बना दरवाज़े पे आ खड़ी हो इक घूँट भरा... "आहा " .हम्म्म। ...बादामी चाय की और देखा और इक हलकी सी मुस्कान के साथ धन्यवाद दिया :)

आकाश यूँ  के मानो किसी कुशल रंगरेज द्वारा रंगा लहराता आँचल हो  .... संतरी, नारंगी से गहरा गुलाबी, कहीं बैगनी-नील लोहित छटा लिये और कहीं हल्की सुनहरी तीखी रेखाएं लिए। सुबह जल्दी उठने का सबसे बड़ा इनाम ये मिलता है कि आकाश अपने सारे रंग उड़ेल देता है देखने वाले पर। पुरे दिन का सबसे सूंदर दृश्य। 

रंगों के ताने-बाने ने सुबह सुबह के सपने में फिर उलझा दिया। हम्म्म फिर क्या हुआ होगा ?
पर
वो जो फ़िरोज़ा  झील थी वो तो "लेक लुइज़"  थी..... कुछ महीने पहले गए थे वहां... बहुत सूंदर झील। ..  फ़िरोज़ा रंग का पानी। टर्कवाइज़ लेक  भी बोलते हैं।  इतनी सूंदर है की बस मौन  बैठ देखते रहूं।

पर 
जिस जगह  मैं बैठी थी वो तो लेक लुइज़  नहीं थी। वो तो, हम्म्म्म... ग्लेनबो प्रोविंशियल पार्क में थी जो मुझे बहुत अच्छी लगती है।  उस  जगह से निचे की और घाटी में पहाड़ियां दिखती हैं। वहाँ आप बिना किसी पहाड़ी पर चढ़े ऊपर होने की अनुभूति  कर सकते हैं।
वहाँ  बैठ  के मुझे किसी ऊँची पहाड़ी पे होने का एहसास होता है ।ऊंची जगह या पहाड़ियों में चढ़ पाने की अपनी अक्षमता के कारण, वहाँ बैठ के निचे घाटी को देखकर अच्छा लगता है मुझे।  अपनी लाचारी और अपनी अक्षमता पर इक अजीब सी विजय प्राप्ति की अनुभूति।
             
और 
वो अल्पाइन लार्च' के लम्बे गहरे हरे पेड़....वो तो " बैंफ एरिया" में देखे थे। गहरे हरे ,इक दूसरे से आसमाँ  को छूने की होड़ लगाए, गहरे हरे पेड़, उनसे इक अजीब सी महक आती है..... चिरपरिचित महक.. कितनी देर वहाँ घूम घूम कर उस महक को सूँघती  रही थी क्यूंकि  वो महक उस महक से बहुत मिलती थी जो हिमाचल में मेरे गांव के पास वाले जंगलों से आती थी जो चीड़ के पेड़ से भरे पड़े थे। चीड़ के पेड़ों की महक .....  
और 
 वो अनेकों रंगों को समेटे आकाश - वो तो यहीं का था, मेरे घर के आंगन से दिखने वाला।  सुबह सुबह का आकाश  रंगों को समेटे यूँ भरा आता है जैसे सारे के सारे रंग मेरे आंगन में उड़ेल देना चाहता हो। ३० मिनट  के अंदर अंदर आकाश संतरी , नारंगी , गहरा बैंगनी,  गहरे गुलाबी रंग से होके  नील लोहित आकाश बन जाता है।  महज़ ३० मिनट  में जाने अनेको रंग दिखा, कुछ देर को नील लोहित रंग से भर आता है जैसे रिझाना चाह रहा हो मुझे। खुद की और आकर्षित करना चाहता हो की बँध जाऊं  उस "नील-लोहित  आकाश" के संग । और विश्वास मानिये बँध भी चुकी हूँ।
और 
वो सैमसंग वाला फ़ोन, वो तो कब का टूट चूका है , और सपने में जिस दोस्त से तस्वीरें साझा की उससे नाता भी. ..... .... 

 हाँ !  यही आदत बन गयी थी, हर पल की खबर, हर ख़ास तस्वीर, हर मुसीबत, हर ख़ुशी, हर दर्द, हर बेफिज़ूल की बात साझा करने की.... जैसे हल मिल जायेगा ....  मनचाहा रिएक्शन - रिस्पॉन्स मिल जाएगा। फोन उठाओ  साझा करो। कैसी आदत बन जाती है कुछ बाते ! फोन  सारा भरा हुआ था जाने कितनी बातों से , जाने कितनी तस्वीरों से और हर तस्वीर की इक कहानी.... इक लम्बी कहानी !
ह्म्मम्म्म्म!

दिमाग ने सब वो पल, जो मुझे बाँध लेते हैं खुद से, मोह लेते हैं , वो सारे टुकड़े जेहन से निकाल-निकाल के जोड़ दिए और इक सपने की रचना कर दी। और आदतन ही वो आदत भी सपने में जुड़ गयी। 

घूँट -घूंट चाय के खत्म होने के साथ साथ  समय भी करवट ले चूका थाऔर अब आकाश के सारे रंग छंट चुके थे। अब ना वो गुलाबी रंग हैं, ना नारंगी, न बैंगनी और ना ही अब वो 'नील-लोहित आकाश' है।

अब बस इक स्थायी रंग है और जो आकाश की असली पहचान है ......हल्का आसमानी रंग।

चाहे वो सब  रंग कितनी भी मनभावन-आकर्षण से भरें  क्यों ना हो कुछ समय के बाद छंट ही जाते हैं आकाश से। रहता है तो बस इक स्थायी  रंग।

क्या आकाश को कभी किसी रंग की आदत हुई होगी ?

  ज़ोया****


#नील-लोहित
# फ़िरोज़ा रंग

गुरुवार, जून 18, 2020

.................................................जीने भी दो यारो !


जीने भी दो यारो उसको  मरके ,
जाके वापिस कभी नहीं आते 
वहाँ वो शायद चैन से होगा 
वहाँ पे इंसां नहीं हैं जाते  
मरके भी देख लिया है उसने 
लोग अब भी बाज़,नहीं हैं आते 
जीते जी तो छोड़ा नहीं 
अब उसपे कायर का दाग़  लगाते 

जीने भी दो यारो कुछ तो 
क्यों  हो विषैले तीर चलाते 
भालों से भी तीखे शब्द हैं 
सब मन पत्थर हो नहीं पाते 
जीने भी दो यारो हमको 
सिखलाती लाश ये जाते जाते 
कम तो बस ये ज़िंदगी है 
मौत का क्या ? मिल जाए आते जाते 


ज़ोया ****

शनिवार, जून 06, 2020

ये मन शरद का फूल है !

तेरी बात - बात सोचूँ  मैं और यूँ ही दिल भरा करूँ,
तेरी चाहतों की याद को, मैं उदासियों से हरा करूँ।

कभी धूल है, कभी शूल है, कभी भारी कोई भूल है
के ये मन शरद का फूल है, इसे कैसे मैं हरा करूँ।

कई ऊँचे घर बना लिए, कई चूल्हे इनसे जला लिए
ये वन जो खाली हो गए इन्हे बीज दूँ और हरा करूँ।

कायी-कायी सारी सवारली, मन भीत भी निखारली
अब बैठे - बैठे ये सोचूँ  मैं, रंग गेरुया या हरा करूँ।


मुझे 'श्याम' से ही आस है, मैं उससे ही तो 'ज़ोया' हूँ 
   उसे मोरपँख से प्रीत है, तो मैं खुद को ही हरा करूं।  

:-ज़ोया ****
शरद का फूल = पतझड़ का फूल 
मन  भीत = मन की दिवार 
ज़ोया = सजीव 
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गुरुवार, मई 21, 2020

शब्द


शब्दों का  क्या है ! 
जितने मर्ज़ी खर्च कर लो
मगर शब्द
कहने में हलके
और सुनने में
भारी होते हैं
कहने वाला
बस कह देता हैं
सुनने वाले के
मन में डूब जाते हैं
फिर घुलते रहते हैं
अंदर ही अंदर
मन की तली में
गलते रहते हैं 
दिन हफ़्तों
महीने सालों
और साल सदियों से
प्रतीत होते हैं

मन की तली में
वो गले-घूले शब्द
रह रह के 
मन की सतह पर
सांस भरने आ जाते हैं
और फिर, और डूब जाते हैं
और फिर,      और घुलते हैं
    और फिर,      और गलते हैं

:-ज़ोया****



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बुधवार, मई 20, 2020

समय की हवा



जाते-जाते 
समय की हवा 
अपने साथ 
कितना कुछ ले गयी 
कुछ यादें कुछ ज़ख्म 
दे गयी मुझे 
रिश्तों के मरहम 
अपने साथ ले गयी। 

आँखों को नपाई 
हाथों को लगन 
युहीं सुलझा लेती हूँ  
कई गणित कठन 
हुनर कैसे-कैसे दे गयी 
बालों का काजल 
आँखों की चमक 
अपने साथ ले गयी। 

गंभीर  स्थिर मन 
इक चुप्पी सी गहन 
प्रौढ़ता के सारे गुण  
समय से पहले दे गयी 
वो खुमारी, वो चुभन 
वो चांदनी की छुअन 
चटक रंग सब  बसंत 
अपने साथ ले गयी। 

आँखों में थकन,
माथे पे शिकन,
रिश्तों में ग्रहण 
मवाद कैसे-२ भर गयी 
पलाश सा तेज़न,
उजले से सपन,
उमंगों की अगन 
अपने साथ ले गयी। 

जून का महीना 
धूप की खान 
यादों का नमक 
मेरे नाम कर गयी। 
जाते-जाते 
समय की हवा 
अपने साथ 
  कितना कुछ ले गयी


:-ज़ोया 


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शनिवार, फ़रवरी 29, 2020

किसी सुबह अंकुरित हो ही जाएगा




मुद्दतों से खारे पानी से  भिगो
चांदनी के नरम कपड़े में लपेट
दिल की लाल गर्म कटोरी में रखा है 
आस का चाँद
किसी सुबह अंकुरित हो ही जाएगा,
फुट आये शायद उसमे नया चाँद कोई 
शायद आस में नवप्राण पड़ ही जाएँ 

पुराने चाँद से तोड़ 
उम्मीदों की पोटली के इक कोने में
संभाल के रख लुंगी उस अंकुरित आस को

जब भी भूखो मरने लगेगी 
उम्मीद कोई फिर आदतन, 
तोड़ के इक टुकड़ा उस चाँद का 
निवाला बना निगल जाऊँगी  
शायद ऐसे ही कर 
भूखी उम्मीदों का पेट भर पाउंगी ! 

मुद्दतें हुईं भिगो के रखा है आस का चाँद
किसी सुबह अंकुरित हो ही जाएगा

:-ज़ोया 
                                                                                                                                                         #ज़ोया 



गुरुवार, फ़रवरी 27, 2020

खबर अब भी नहीं तुमको ?


खड़ी मायूस हूँ कबसे
खबर ये भी नहीं मुझको 
जमीं ये जल गयी कैसे
खबर ये भी नहीं तुमको !

मेरे घर का जो हो तिनका 
सहेजे उसको फिरती हूँ 
तो फिर बस्ती जली कैसे 
खबर अब भी नहीं तुमको !

सड़क ऐसे थी इक पहले 
शहर पहले भी ऐसा था 
गली देहकी थी  हर ऐसे 
खबर ये भी नहीं तुमको ?

वो  शायर है जो कहता है 
है शामिल खून हम सब का 
लो अब मिट्टी हुई काली
खबर ये भी क्या है तुमको ?

खड़ी मायूस हूँ कबसे
खबर ये भी नहीं मुझको 
गली हर जल उठी फिर से ,
खबर अब भी नहीं तुमको ?


:-ज़ोया 
#ज़ोया 


बुधवार, नवंबर 20, 2019

बेटी के माँ बाप




''तुम नहीं समझोगी, माँ बाप का दुःख, बहु।  अपने  बच्चे दूर बैठे हैं और हम बूढ़े  यहां अकेले। कोई पूछने वाला नहीं। तुम लोग महीने में दो बार चक्कर  काट जाते हो, एक आधी  बार दुसरा बेटा बहु आ जाते हैं..... .... और फिर हम दोनों अकेले। हमने सारी  ज़िंदगी बेटों पर ही लगा दी।  सारा जीवन बस इनके लिए सेक्रेफाइज़ करते रहे,'' सासु माँ, सूट्स  (जो मैं सासु माँ  के लिए लायी थी, हर बार की तरह ) पर हाथ फेरते फेरते बोली।  

पुरे हफ्ता कॉलेज और यूनिवर्सिटी की भागमभाग और फिर पुरे दिन के सफर के कारण पूरा शरीर बदहाल हो रहा था।  गर्दन तो यूँ के  शायद टूटने वाली हो।  गर्दन को हल्का हल्का हिलाया ताकि कुछ आराम आये। 


''तुम रोज़ फोन नहीं करती।  ऐसा करो शाम का  आलार्म  सेट कर लो ताकि याद रहे की इधर फोन करना है।  तुम्हारे बढ़े तायाससुर की  बहु  के भाई की  शादी थी तुमने तब भी उन्हें बधाई का फोन नहीं किया ? बुआ बोल रही थी की तुम्हारी बहु तो  फोन  नहीं करती।  यही चचीसास बोल रहीं थी।  रिश्ते निभाने होते हैं।  ज़्यादा  ओवर  क़्वालिफ़ाइड  होने का मतलब ये नहीं होता की रिश्ते ना निभाओ ''

ससुर जी ने चाय का मग रखते हुए कहा, '' हमने तो अपने मुहं से कभी बेटे से इक रुपया नहीं माँगा।  तुम्हारी शादी में भी तुम्हारे पापा ने जो दिया तुम्हारे लिए ही दिया हमने तो कुछ नहीं माँगा। और जो दिया भी वो तो देना ही  होता  है।  बेटों को बढ़ा किया, पढ़ाया, नौकरी करवाई , तुम्हारे गहने बनवाये।, सारा जीवन बस इनके लिए सेक्रेफाइज़ करते रहे......... .contin.

इतने सालों में ये सारे डायलॉग जैसे रट्ट से गए हैं।  ईवन  अब अगला डायलॉग खुद ही दिमाग पहले बोलने लग जाता  है और इक आधा मिस हो जाए तो लगता है अरे  वो डायलॉग नहीं बोला। पहले पहले आँखें फाड़  फाड़ कर देखती थी। ..अअअअअअअअअ क्या ? क्या बोला ? कभी कुछ  माँगा। really ??? सारी शादी की रस्मे इक ओल्ड हिंदी मूवी  की तरह आँखों के सामने घूमने लगती थीं ।  वो सारी  कड़वाहट जो इक अच्छे खासे शादी के दिन को कसैला कर चुकी थी। हर रसम में , हर बात पर पैसा पैसा। और भी ना जाने हज़ार ख़्याल  इक दूजे सी ही सर टकराने लगते।

पर अब .हम्म्म ..... ....पर अब आदत पड़  गयी है।



तभी ये बोले, '' पापा ये डेढ़  लाख की पेमेंट की रसीद। सॉरी लेट हो गया।  कारपेंटर के 12  हज़ार देने रहते हैं. अगले महीने देता हूँ। आपने जो-जो  सामान मंगाया था, आकांक्षा चाय पी के निकाल  के दिखा देगी, आप चेक कर लेना।
मैंने मुस्कुरा के हामी भर दी ..... ...

ससुर जी, चाय की चुस्की भरते हुए बोले, " पिछली बार भी लेट हुए थे तुम।  ध्यान रखो ज़रा।

ये चुपचाप चाय पीते रहे। पहले मेरे दिमाग में गुथमगुथि होने लगती थी।  शादी के वक़्त से इनपे इतना कर्ज़ा चढ़ा हुआ है वो उतार रहे हैं,मेरी सैलरी से घर चल रहा हैं, और गहने..... ...उतने गहनों का  इतने लाखों का बिल, फलाना ढिमकाना ब्लाह ब्लाह

पर अब. ....हम्म्म ..... ....पर अब आदत पड़  गयी है।

मैं भी शान्ति से चाय का घूंट भरती  रही.

अगले 3  दिन यही सब बातें  कम से कम 20  बार और सुनी और अनसुनी की।  मंडी जा के पुरे महीने का राशन रखवाया।  सास ससुर को कुछ शॉपिंग करनी थी वो करवाई।  सभी सगे सम्बन्धियों  के  घर जा के मिठाई के डिब्बे ले  मिलने गए, सबकी शिकायतें सुनी, शिकायतें कम ताने ज़्यादा कहें उन्हें वैसे।  इक स्माइलिंग रोबोट की तरह सब काम निपटाए

वापसी के वक़्त, पैरी पैना करते वक़्त , सास बोली, '' हर बार सोचती हूँ तुझे सूट दिलवाऊंगी सुंदर सा पर हर बार रह ही जाता हैं, अगली बार सही।


इक मुस्कान के साथ मैं बोल उठी, '' आपका आशीर्वाद ही सब कुछ हैं मम्मी जी और सब आपका दिया ही तो हैं।

तुम्हारे मम्मी पापा का क्या हाल है, बहु? मिलने गयी ?

बहुत अच्छे  से हैं।  मिलने नहीं जा सकी।  काफी महीने हो गए मिले, फोन पर बात हो जाती हैं।

हाँ -हाँ , ठीक भी है , अपनी गृहस्थी  सम्भालो , नौकरी करो।

मैंने इक मुस्कान के साथ सर हिलाया।
ह्म्म्मम्म और इक बार फिर से वही शब्द '''''''''''''''''''''''''

''तुम नहीं समझोगी माँ बाप का दुःख, बहु। हम बूढ़े  यहां अकेले।  हमने सारी  ज़िंदगी बेटों पर ही लगा दी।  सारा जीवन बस इनके लिए सेक्रेफाइज़ करते रहे।

इक मुस्कराहट के साथ इक बार फिर से पैरी पैना कर के कार में बैठ  गयी।

कार सरपट सड़कों पे दौड़े जा रही थी और साथ ही दौड़ने लगी मेरी सोच भी।  अब खुद से ही संवाद करने की आदत पढ़ सी गयी है।
अपने  माँ बाप की अकेली बेटी हूँ, मध्यवर्गीय परिवार है , पापा ने अपनी तीन बहनों को  पाला, बढ़ा किया, पढ़ाया लिखाया, शादी करवाई क्योंकि दादा दादी बहुत पहले गुज़र गए थे।  फिर मुझे पाला पौसा ,  पढ़ाया  सिखाया।  शिक्षा की सबसे ऊँची डिग्री दिलाई , नौकरी करवाई, शादी की ,और  मुझसे कभी इक रुपया तक नहीं लिया। मेरी सैलरी का कभी एक सिक्का नहीं लिया।  मेरे लाख कहने पर भी नहीं।  Even,  आज भी हर तीज त्योहार या जितनी बार आना जाना होता है किसी ना किसी बहाने बहुत कुछ  देते ही हैं।  ना कभी खाली हाथ आये ना कभी खाली हाथ जाने दिया।  और जितनी बार मैंने उनके लिए कुछ किया तो किसी ना किसी बहाने लाड प्यार के साथ लौटा दिया। मगर अपनी  पूरी ज़िंदगी में मैंने उनके मुंह से ये नहीं सुना हमने ये किया, हमने वो किया फलाना ढिमकाना ब्लाह ब्लाह।  ना कभी कोई शिकायत

अचानक फोन की रिंग बजने से वापिस वर्तमान में आयी..........""मम्मा का फोन ""

हेलो मम्मा , क्या हाल हैं ?

हम बिलकुल ठीक ठाक  हैं , तू बहुत थकी थकी सी बोल रही हैं , पूरा वक़्त दौड़ दौड़ लगी रहती है तेरी।  छुट्टी ले के कुछ रोज़ मिलने आ जा कितने महीने हो गए देखे तुझे। और फिर बातों एक सिलसिला शुरू।

"अच्छा मम्मा, अब फोन रखती हूँ, सर बहुत दुःख रहा हैं , घर पहुँच कर आराम से बहुत सी बातें करती हूँ।"

हाँ ठीक है ध्यान रखा कर , कुछ दिन छुट्टी ले के आराम कर।  अच्छा सुन! मैंने  सर्दी के दो मोटे  पश्मीने के सूट लिए थे  तेरे लिए , सिलवा  भी दिए हैं।  और बेसन-अलसी  के लड्डू भी बना के रखे हैं।  सर्दियाँ  आ रही हैं, तुम  दोनों इतनी भाग दौड़ करते रहते हो।  सेहतमंद  चीज़ें खाना बड़ा ज़रूरी है।  आ सके तो बहुत अच्छा, और नहीं, तो कूरियर करवा दूँ क्या ?

गला इतना भर आया के कुछ बोले नहीं बना। सम्भलते हुए बोला, ''घर जा के बात करती हूँ मम्मा''।

फोन रखते ही, सोच के जाल बनने लगे।

"सुनो, अगले हफ्ते मम्मा-पापा से मिलने जा सकते हैं, कितने महीने हो गए उन्हें मिले", मैंने इनसे पूछा।


"इतनी भाग-दौड़, पूरा वक़्त आफिस-घर, आफिस-घर और फिर मम्मी पापा से मिलने आना इधर।  अगले  महीने देखते हैं।  आई ऍम वैरी टायर्ड एंड  बैडली नीड ए ब्रेक'', ये सड़क पर नज़र टकाये बोले।

सर सीट पर टिकाते हुए कार की छत की और देखने लगी और सोच ने फिर अपनी आगोश में  ले लिया। इक दम  से दिमाग में कुछ कौंधा, फोन उठाया, लीव एप्लीकेशन सेंड की और फोन मिलाया

हाँ,  बेटा क्या हुया ? मम्मा ने  फ़िक्र भरी आवाज़ में पूछा

मम्मा! कुरिअर मत करवाना, मैं  कल शाम आपके पास पहुँच रही हूँ।

इनका रिएक्शन  देखने का ना मेरा मन था और ना ही मुझे जरूरत है ।

 सर फिर सीट से टिका लिया  और  इस बार सोच ने नहीं, इक सकूँ भरी  नींद  ने आगोश में  भर लिया।

:-ज़ोया 
#ज़ोया 



मंगलवार, नवंबर 05, 2019

अब बस ख़त्म करो ये तजस्सुम "ज़ोया "




कतरा - कतरा ये रात पिघल जाने लगी,
इक उम्मीद थी आपके आने की, जाने लगी। 

काटी हैं सब रातें जगरतों में हमने, 
थक से गये हैं अब, नींद आने लगी। 

 बरसा है ये बादल यूँ मेहरबान हो के,  
रोया है वो दिल खोल के, फ़िक्र खाने लगी। 

किसी मिक़नातीस से हैं माज़ी की यादों के क़ुत्बे,
कस्स के लगे जब सिने से, सकूं पाने लगी। 

अब बस ख़त्म करो ये तजस्सुम  "ज़ोया "
कस्तूरी तो मिली नहीं, जान जाने लगी !

:-ज़ोया 
#ज़ोया 




मिक़नातीस - चुंबक , Magnet
कुतबे - कब्र पे लगा पत्थर
तजस्सुम - search, खोज 

June 11,2010

बुधवार, अक्तूबर 23, 2019

साहिल पे हैरान खड़ी हूँ मैं




साहिल पे हैरान खड़ी हूँ मैं
वो दो नन्हे नन्हे से हाथ 
उस बेज़ान सी रेत से 
सौ  बार घर बना चुके हैं 

हर बार ज़ोरदार लहर आती है 
और उन नन्हे हाथों से बने घर को 
तोड़ अपने साथ बहा ले जाती है 
इक बार लहर की तरफ देख 
मुँह बना कुछ बड़बड़ाता है
और वो फिर नए जोश के साथ
उस बेज़ान रेत को इक्कठा कर 
फिर से नया घर बना लेता है 

और इधर इक मैं हूँ
यही कोई 40-50 बार ही तो 
उम्मीदें टूटी होंगी मेरी
चेहरे पे मायूसी साफ़ दिखती है 
कलम से उदासी झरती रहती है  
मानो जिंदगी की दौड़ में 
अकेली दौड़ के भी 
सब से पीछे रह गयी हूँ मैं 
जैसे बस हार गयी हूँ मैं । 

"हे  प्रभु"
या तो मेरे हाथों को 
उन दो नन्हे हाथों सा 
मज़बूत कर दे 
या अब मेरी उम्मीदों को 
साहिल की रेत सा बेज़ान कर दे !   

:-ज़ोया

मंगलवार, अक्तूबर 15, 2019

'' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !''


धुल जम चुकी है चाँद पे क्या ?
या सिलबट्टे पे खुद को घिसता रहता है?
ना जाने ये चाँद क्यूँ रातों में अक्सर 
कतरा-कतरा मुझपे गिरता रहता है? 
मुंह बिचकाये रहता है, और
कहता है-'तुमने मुझको छोड़ दिया
उतर आई हो खुद ज़मीन पे, और
 मुझको ऊपर तन्हा छोड़ दिया
सालों का था याराना अपना
तुमने चंद रस्मों में तोड़ दिया।

कहा था मुझसे इन सितारों ने 
समझाया था रात के गलियारों ने 
    '' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !''
इक बार तुमने भी तो
 आंसूं पिरोते कहा था ना मुझसे
 '' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !''
वक़्त पड़े, तुम्हारे हो गए  
वक़्त पलटे तो पलट गए  
ठीक ही कहा था तुमने मुझसे 
 '' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !''

इक वक़्त वो भी था जब तुम, 
अक्सर मेरी गोद में सोतीं थीं 
पहरों बातें करती थीं मुझसे 
आँख मिचौली खेला करतीं थीं
आंसू पिरो के देती थीं तुम मुझको
मैं माला पहन कितना इतराता था
तुम नज़्मे-नगमे लिखती रातों को
और मैं पौ फटे तक सुनता था।

और आज ये दिन है देखो तो 
तुम वहां ज़मीन पे सोती हो, 
ना बातें करती हो मुझसे 
ना आँख मिचौली खेला करती हो। 
रहती हो मुझसे अलग-अलग सी 
आँखे खोले जागे-जागे सोती हो। 
सम्भाल लेती हो आँसूं जाने कहाँ तुम?
जाने किसको मेरी माला दे देती हो?
सच कहा था इन सितारों ने, गलियारों ने
और सच ही कहा था तुमने भी मुझसे
'' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !'

:-ज़ोया

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