बुधवार, नवंबर 20, 2019

बेटी के माँ बाप




''तुम नहीं समझोगी, माँ बाप का दुःख, बहु।  अपने  बच्चे दूर बैठे हैं और हम बूढ़े  यहां अकेले। कोई पूछने वाला नहीं। तुम लोग महीने में दो बार चक्कर  काट जाते हो, एक आधी  बार दुसरा बेटा बहु आ जाते हैं..... .... और फिर हम दोनों अकेले। हमने सारी  ज़िंदगी बेटों पर ही लगा दी।  सारा जीवन बस इनके लिए सेक्रेफाइज़ करते रहे,'' सासु माँ, सूट्स  (जो मैं सासु माँ  के लिए लायी थी, हर बार की तरह ) पर हाथ फेरते फेरते बोली।  

पुरे हफ्ता कॉलेज और यूनिवर्सिटी की भागमभाग और फिर पुरे दिन के सफर के कारण पूरा शरीर बदहाल हो रहा था।  गर्दन तो यूँ के  शायद टूटने वाली हो।  गर्दन को हल्का हल्का हिलाया ताकि कुछ आराम आये। 


''तुम रोज़ फोन नहीं करती।  ऐसा करो शाम का  आलार्म  सेट कर लो ताकि याद रहे की इधर फोन करना है।  तुम्हारे बढ़े तायाससुर की  बहु  के भाई की  शादी थी तुमने तब भी उन्हें बधाई का फोन नहीं किया ? बुआ बोल रही थी की तुम्हारी बहु तो  फोन  नहीं करती।  यही चचीसास बोल रहीं थी।  रिश्ते निभाने होते हैं।  ज़्यादा  ओवर  क़्वालिफ़ाइड  होने का मतलब ये नहीं होता की रिश्ते ना निभाओ ''

ससुर जी ने चाय का मग रखते हुए कहा, '' हमने तो अपने मुहं से कभी बेटे से इक रुपया नहीं माँगा।  तुम्हारी शादी में भी तुम्हारे पापा ने जो दिया तुम्हारे लिए ही दिया हमने तो कुछ नहीं माँगा। और जो दिया भी वो तो देना ही  होता  है।  बेटों को बढ़ा किया, पढ़ाया, नौकरी करवाई , तुम्हारे गहने बनवाये।, सारा जीवन बस इनके लिए सेक्रेफाइज़ करते रहे......... .contin.

इतने सालों में ये सारे डायलॉग जैसे रट्ट से गए हैं।  ईवन  अब अगला डायलॉग खुद ही दिमाग पहले बोलने लग जाता  है और इक आधा मिस हो जाए तो लगता है अरे  वो डायलॉग नहीं बोला। पहले पहले आँखें फाड़  फाड़ कर देखती थी। ..अअअअअअअअअ क्या ? क्या बोला ? कभी कुछ  माँगा। really ??? सारी शादी की रस्मे इक ओल्ड हिंदी मूवी  की तरह आँखों के सामने घूमने लगती थीं ।  वो सारी  कड़वाहट जो इक अच्छे खासे शादी के दिन को कसैला कर चुकी थी। हर रसम में , हर बात पर पैसा पैसा। और भी ना जाने हज़ार ख़्याल  इक दूजे सी ही सर टकराने लगते।

पर अब .हम्म्म ..... ....पर अब आदत पड़  गयी है।



तभी ये बोले, '' पापा ये डेढ़  लाख की पेमेंट की रसीद। सॉरी लेट हो गया।  कारपेंटर के 12  हज़ार देने रहते हैं. अगले महीने देता हूँ। आपने जो-जो  सामान मंगाया था, आकांक्षा चाय पी के निकाल  के दिखा देगी, आप चेक कर लेना।
मैंने मुस्कुरा के हामी भर दी ..... ...

ससुर जी, चाय की चुस्की भरते हुए बोले, " पिछली बार भी लेट हुए थे तुम।  ध्यान रखो ज़रा।

ये चुपचाप चाय पीते रहे। पहले मेरे दिमाग में गुथमगुथि होने लगती थी।  शादी के वक़्त से इनपे इतना कर्ज़ा चढ़ा हुआ है वो उतार रहे हैं,मेरी सैलरी से घर चल रहा हैं, और गहने..... ...उतने गहनों का  इतने लाखों का बिल, फलाना ढिमकाना ब्लाह ब्लाह

पर अब. ....हम्म्म ..... ....पर अब आदत पड़  गयी है।

मैं भी शान्ति से चाय का घूंट भरती  रही.

अगले 3  दिन यही सब बातें  कम से कम 20  बार और सुनी और अनसुनी की।  मंडी जा के पुरे महीने का राशन रखवाया।  सास ससुर को कुछ शॉपिंग करनी थी वो करवाई।  सभी सगे सम्बन्धियों  के  घर जा के मिठाई के डिब्बे ले  मिलने गए, सबकी शिकायतें सुनी, शिकायतें कम ताने ज़्यादा कहें उन्हें वैसे।  इक स्माइलिंग रोबोट की तरह सब काम निपटाए

वापसी के वक़्त, पैरी पैना करते वक़्त , सास बोली, '' हर बार सोचती हूँ तुझे सूट दिलवाऊंगी सुंदर सा पर हर बार रह ही जाता हैं, अगली बार सही।


इक मुस्कान के साथ मैं बोल उठी, '' आपका आशीर्वाद ही सब कुछ हैं मम्मी जी और सब आपका दिया ही तो हैं।

तुम्हारे मम्मी पापा का क्या हाल है, बहु? मिलने गयी ?

बहुत अच्छे  से हैं।  मिलने नहीं जा सकी।  काफी महीने हो गए मिले, फोन पर बात हो जाती हैं।

हाँ -हाँ , ठीक भी है , अपनी गृहस्थी  सम्भालो , नौकरी करो।

मैंने इक मुस्कान के साथ सर हिलाया।
ह्म्म्मम्म और इक बार फिर से वही शब्द '''''''''''''''''''''''''

''तुम नहीं समझोगी माँ बाप का दुःख, बहु। हम बूढ़े  यहां अकेले।  हमने सारी  ज़िंदगी बेटों पर ही लगा दी।  सारा जीवन बस इनके लिए सेक्रेफाइज़ करते रहे।

इक मुस्कराहट के साथ इक बार फिर से पैरी पैना कर के कार में बैठ  गयी।

कार सरपट सड़कों पे दौड़े जा रही थी और साथ ही दौड़ने लगी मेरी सोच भी।  अब खुद से ही संवाद करने की आदत पढ़ सी गयी है।
अपने  माँ बाप की अकेली बेटी हूँ, मध्यवर्गीय परिवार है , पापा ने अपनी तीन बहनों को  पाला, बढ़ा किया, पढ़ाया लिखाया, शादी करवाई क्योंकि दादा दादी बहुत पहले गुज़र गए थे।  फिर मुझे पाला पौसा ,  पढ़ाया  सिखाया।  शिक्षा की सबसे ऊँची डिग्री दिलाई , नौकरी करवाई, शादी की ,और  मुझसे कभी इक रुपया तक नहीं लिया। मेरी सैलरी का कभी एक सिक्का नहीं लिया।  मेरे लाख कहने पर भी नहीं।  Even,  आज भी हर तीज त्योहार या जितनी बार आना जाना होता है किसी ना किसी बहाने बहुत कुछ  देते ही हैं।  ना कभी खाली हाथ आये ना कभी खाली हाथ जाने दिया।  और जितनी बार मैंने उनके लिए कुछ किया तो किसी ना किसी बहाने लाड प्यार के साथ लौटा दिया। मगर अपनी  पूरी ज़िंदगी में मैंने उनके मुंह से ये नहीं सुना हमने ये किया, हमने वो किया फलाना ढिमकाना ब्लाह ब्लाह।  ना कभी कोई शिकायत

अचानक फोन की रिंग बजने से वापिस वर्तमान में आयी..........""मम्मा का फोन ""

हेलो मम्मा , क्या हाल हैं ?

हम बिलकुल ठीक ठाक  हैं , तू बहुत थकी थकी सी बोल रही हैं , पूरा वक़्त दौड़ दौड़ लगी रहती है तेरी।  छुट्टी ले के कुछ रोज़ मिलने आ जा कितने महीने हो गए देखे तुझे। और फिर बातों एक सिलसिला शुरू।

"अच्छा मम्मा, अब फोन रखती हूँ, सर बहुत दुःख रहा हैं , घर पहुँच कर आराम से बहुत सी बातें करती हूँ।"

हाँ ठीक है ध्यान रखा कर , कुछ दिन छुट्टी ले के आराम कर।  अच्छा सुन! मैंने  सर्दी के दो मोटे  पश्मीने के सूट लिए थे  तेरे लिए , सिलवा  भी दिए हैं।  और बेसन-अलसी  के लड्डू भी बना के रखे हैं।  सर्दियाँ  आ रही हैं, तुम  दोनों इतनी भाग दौड़ करते रहते हो।  सेहतमंद  चीज़ें खाना बड़ा ज़रूरी है।  आ सके तो बहुत अच्छा, और नहीं, तो कूरियर करवा दूँ क्या ?

गला इतना भर आया के कुछ बोले नहीं बना। सम्भलते हुए बोला, ''घर जा के बात करती हूँ मम्मा''।

फोन रखते ही, सोच के जाल बनने लगे।

"सुनो, अगले हफ्ते मम्मा-पापा से मिलने जा सकते हैं, कितने महीने हो गए उन्हें मिले", मैंने इनसे पूछा।


"इतनी भाग-दौड़, पूरा वक़्त आफिस-घर, आफिस-घर और फिर मम्मी पापा से मिलने आना इधर।  अगले  महीने देखते हैं।  आई ऍम वैरी टायर्ड एंड  बैडली नीड ए ब्रेक'', ये सड़क पर नज़र टकाये बोले।

सर सीट पर टिकाते हुए कार की छत की और देखने लगी और सोच ने फिर अपनी आगोश में  ले लिया। इक दम  से दिमाग में कुछ कौंधा, फोन उठाया, लीव एप्लीकेशन सेंड की और फोन मिलाया

हाँ,  बेटा क्या हुया ? मम्मा ने  फ़िक्र भरी आवाज़ में पूछा

मम्मा! कुरिअर मत करवाना, मैं  कल शाम आपके पास पहुँच रही हूँ।

इनका रिएक्शन  देखने का ना मेरा मन था और ना ही मुझे जरूरत है ।

 सर फिर सीट से टिका लिया  और  इस बार सोच ने नहीं, इक सकूँ भरी  नींद  ने आगोश में  भर लिया।

:-ज़ोया 
#ज़ोया 



17 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 21 नवम्बर 2019 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

मन की वीणा ने कहा…

एक सच जो सब देखते हैं महसूस करते हैं पर सरेआम स्वीकार कोई नहीं करता, प्रायः
सभी बेटे बहूओं पर इल्ज़ाम देते हैं वृद्ध माता-पिता के साथ अन्याय का ढिंढोरा पीटते हैं बहु को कोसते हैं, पर सच ये भी हो सकता है कोई नहीं देखना चाहता।
ज़ोया जी बहुत बहुत सुंदर प्रस्तुति है आपकी हृदय को स्पर्श करती मथती ।
सार्थक रचना ।

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार (22-11-2019 ) को ""सौम्य सरोवर" (चर्चा अंक- 3527)" पर भी होगी।
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिये जाये।
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
*****
-अनीता लागुरी'अनु'

Anuradha chauhan ने कहा…

बेहद हृदयस्पर्शी कहानी

Rishabh Shukla ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति

kuldeep thakur ने कहा…


जय मां हाटेशवरी.......

आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
आप की इस रचना का लिंक भी......
24/11/2019 रविवार को......
पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
शामिल किया गया है.....
आप भी इस हलचल में. .....
सादर आमंत्रित है......

अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
http s://www.halchalwith5links.blogspot.com
धन्यवाद

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

yashoda JI

Meri rchnaa ko padhne aur chrchaa me sthan dene ke liye bahut bahut bdhayii

yuhin housla bdhaate rahen

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

Kusum ji,

hmmmm....stay ke bahut rang hote hain ...hume uski saarthkta ko bhi dekhnaa chahiye

saalon pehale ka saty ab saarthak nhi rhaa \

itni gehraayi se kahaani ko pdhne ke liye dil se aabhaar

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

Ravindra Singh Yadav
जी नमस्ते

bahut bahut aabhar aapka kahani ko sthaan dene ke liye

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

Anuradha chauhan ji

bahut bahut aabhar aapka

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

Rishabh Shukla ji

blog tak aane, kahaani ko apna samy dene ke liye aur srahaane ke liye bahut aabhaar

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

kuldeep ji

kahaani ko chrchaa me sthaan dene ke liye aabhaar

Meena Bhardwaj ने कहा…

यही होता है पीढ़ी दर पीढ़ी ..पता नहीं क्यों सोचे बदलती क्यों नहीं ? एक कसक सी मन को व्यथित करती हृदयस्पर्शी और चिन्तनपरक कहानी ।

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

Meena ji

hmmm...hum khud hi kasurwaar hain.....humne hi to bnaya he ye smaaj..ye sab..hmmmmm....:)

main yahi chahti thi ki is lekh ko isi nazriye se pdhaa jaaye jis trha aaapne pdhaa....

bahut bahut dhanywaad

संजय भास्‍कर ने कहा…

बेहद हृदयस्पर्शी प्रस्तुति....ज़ोया जी

संजय भास्‍कर ने कहा…

Recent Post शब्दों की मुस्कराहट पर मेरा मफलर:)

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

संजय भास्‍करji

hmeshaa ki rha sath dene aur utsaah bdhaane ke liye dil se aabhar