मंगलवार, जून 30, 2020

बिन्ना


"चार दिन में इतना ही बिन्न पायी बिन्ना ,गुणवंती नहीं बनी तो देखना, ससुराल जायेगी तो सास कानों में गर्म तेल ढूंस देगी सुना-सुना के ," सर पर हल्की सी चपत लगा अम्मा ने खीज के कहा।  

सात साल की उम्र में ये समझना बड़ा मुश्किल लगता था की बिंन्ने में पलसेटे कैसे डालूं , बालों की चोटी बनाना ही इतना मुश्किल लगता था मुझे , इस झाड़ फूंस से कैसे गूँधूँ ।  पर अम्मा से ये सब कहने की हिम्मत नहीं होती थी सो छोटी छोटी आँखे फाड़-फाड़ कर देखती रहती। 

मगर सास के तानों वाली बात से बहुत डर  लगता था मुझे । सास सच में गर्म तेल डाल देगी कानों में।  सरसों का डालेगी या तिल  का।  "है बाबा जी" तिल  का ना डाले बड़ी बदबू लगती है उसकी मुझे , सरसों का फिर ठीक है, उसकी तो आदत है। नहीं-नहीं  मैं अच्छी से बिन्ना बिंनना सीख लूँगी, तेल नहीं डलवाना मुझे।  

अभी ये सब सोच रही थी अम्मा ने इक और चपत लगाई सर पर, "क्या सोचती रहती है बैठे-बैठे , बिन्ना जल्दी कर पूरा।"  

पूरी रात जाग के बार-बार कोशिश करती और आखिरकार बिन्ना बिन्न ही डाला।  पूरा दिन सर पे उठाये घूमती रही, ऐसी ख़ुशी जाने क्या हासिल कर लिया हो। उसी पे बैठ के खाना खाना, उसी पे बैठ के खेलना।  
अम्मा हँस के बोली -पगलैट कहीं की और फिर गोद में बिठा लिया। सगों से भी सगी लगती थी अम्मा मुझे।  अम्मा के गले लग के मैंने पूछा,"अम्मा! अब तो सास मेरे कानों में गर्म तेल नहीं डालेगी ना ? अब तो मैं गुणवंती हो गयी ना?"
अम्मा ने मेरी कस के बाँधी हुई छोटी-छोटी चोटियों को खोला और प्यार से धीरे-धीरे सर सहलाते हुए बोली, 

" गुणवंता  ना होइऐ, होइए भागवंत ! भागवंत के द्वार पर खड़े रहैं  गुणवंत "

विश्वास कीजिये मुझे उस समय कुछ समझ में नहीं आया।   

मैं फिर आँखें बड़ी कर देखने लगी - ये क्या कह रही है अम्मा।  अम्मा ने सर सहलाना ज़ारी रखा और लम्बी साँस भरते हुए बोली ," लाडो ये सब तो तेरे अपने सुख के लिए है,गुणी  बन। 

मैं ऊपर उचक के अम्मा के कान देखने लगी। 

अरी ! ये क्या कर रही है?

अम्मा तुम्हारे कानों में डाला सास ने गर्म तेल ?

अम्मा ज़ोर  से हँसी और साथ ही आँखों में पानी भी आ गया - "तो तुझे क्या लगता है, मुझे कम क्यों सुनाई देता है?" 

और हँसते हुयी उठ गयी।  

पूरी रात यही सोचती रही, मैं बहुत अच्छी बनुँगी, गुणी, ..ताकि  कोई कान में तेल ना डाले। अम्मा तो इतनी अच्छी है, कितना स्वाद खाना बनाती है, कितनी अच्छी सफाई करती हैं, सब काम! बेचारी अम्मा! तभी इतना ऊँचा सुनाई देता है अम्मा को । 

सोने से पहले हाथ जोड़ के ध्यान किया और मन ही मन प्रार्थना की" है बाबा जी, मेरे कान में कोई तेल ना डाले और गर्म  तिल  का तो कभी भी नहीं। "

बिन्ना बनाने में इतनी दक्ष हो गयी के,रंग बिरंगे धागे गूंध के,कोडियां लगा के, घुँघरू लगा के तरह-तरह से सजा लेती। हर शादी बयाह में हर दुल्हन को बिन्ना बना के भेंट करती। 

बिन्ने के साथसाथ हर कार्य में भी, घर का, बाहर का, सिलाई, कढ़ाई,पढ़ाई सब। जब सब के मुँह से मेरे लिए कही अच्छी बातें कानों में जातीं तो बहुत ख़ुशी होती।

आगे की पढ़ाई करने के लिए जब गाँव छोड़ा तो अम्मा ने हँस के कहा,"गर्म तेल के डर से बिन्ना तो छोड़ हर काम में गुणी बन गयी लाडो!"

"हाँ अम्मा! तुमने अनजाने में ही सीखा दिया हर काम में अच्छा होना, हर काम अच्छे से करना !"

"बस कर रहने दे, गर्म तेल ना कान में जाए इसीलिए सीख गयी सब" अम्मा की बात सुन  आस पास के सब हंस पड़े। 

जाते-जाते अम्मा ने वो बिन्ना, जो जाने कब से संभाल के रखा था(जो मुझे भूल भी चूका था) थमा दिया, कहा कुछ नहीं। 

एक के बाद एक कक्षा में आगे बढ़ती गयी, पी.एच.डी डिग्री, महाविद्यालय में लेक्चरर, साथ-साथ शोधकार्य, बयाह, गृहस्ती, बेटा....सब पड़ावों को सम्पूर्णता से जीते-जीते कब ज़िंदगी आगे बड़ती गयी, पता ही नहीं चला। ज़िंदगी का बिन्ना पूरी निष्ठा और स्नेह से बिनंती गयी। पर हर किसी को बुन्तर पसंद,शायद आये ये ज़रूरी नहीं।  

अम्मा से उनकी रुखसती से पहले इक बार मिली तो मेरे बेटे के सर पर हाथ रखते हुए बोली "भागवन्त होइयो" 

झुर्रियों वाले चेहरे पे वो अम्मा की मुस्कान ज़ेहन में सदा के लिए बस गई, जहाँ उनकी हर याद और हर बात बसी हुई है।  

हम्म्म्म.... 

पर अम्मा गुणवंता होना हमारे हाथ में होता है, भागावंत होना नहीं। तुमने गुणवंता होना तो सीखा दिया , भागावंत कैसे होना है ये क्यों नहीं सिखाया। क्यों नहीं बताया की आप चाहे जितना मर्ज़ी गुणवान हो जाओ, रिश्तों में आदर, सत्कार और प्यार मिलना भाग की बात होती है। 

मैंने रिश्तों का हर बिन्ना बहुत निष्ठा, प्रेम और परिश्रम से बुना, लगाव की कोडियां सजायीं, स्नेह और प्रेम के रंग-बिरंगे धागे से इक-इक तिनका जोड़-जोड़ आगे बीना, समर्पण, सत्कार, हर  तरह के घुँघरू लगाए, बहुत प्यार से सहेजा, सब किया। 

मगर मेरे कानों में रह-रह के तेल पड़ता है अम्मा और वो भी गरम तिल का तेल। और अब तो मुझे भी बहुत कम सुनाई देता है अम्मा।  

  ज़ोया****



बिन्ना - पहाड़ी (हिमाचली बोली) में बोला जाता है, सूखी फूस या मक्की के सूखे छल्लों को आगे जोड़-जोड़ कर चोटी की तरह बिना जाता है, और बैठने के काम आता हैं।  


" गुणवंता  ना होइऐ, होइए भागवंत ! भागवंत के द्वार पर खड़े रहैं  गुणवंत "
गुणवान होने से ज़्यदा अच्छे भागों वाला होना अच्छा होता हैं, जिसके भाग अच्छे उसके द्वार पर गुणवान लोग काम करते हैं।  

इक और कहावत भी " रूप चूरे भाग खाये" यानि जो रूपवान हैं, गुणवान है मेहनत कर और चूर-चूर कर के रोटी खोजता है और खाता है जबकि भागों वाला बिना कुछ किये सब पा जाता है। 

28 टिप्‍पणियां:

Sweta sinha ने कहा…

जी, मेरे विचार से
जीवन जीने के लिए व्यक्ति का गुणवंता होना महत्वपूर्ण है भगवंता बने रहने के लिए कर्मठता की आँच निरंतर जलाये रखना आवश्यक है।
प्रिय जोया जी,
बहुत सुंदर लेखन,सहज प्रवाह जो पाठकों को बाँध लेता है।
रचना के अंत में आपके द्वारा किया गया शाब्दिक विश्लेषण रचना को और भी सहज बना रहा है।
एक विनम्र अनुरोध है आपसे कृपया अन्यथा मत लीजियेगा वर्तनी त्रुटियों पर ध्यान देने से आपकी रचनाओं की शोभा द्विगुणित हो जायेगी।
सस्नेह।

VenuS "ज़ोया" ने कहा…


Sweta sinha जी
आप ब्लोग तक आयी और इतनी लम्बी कहानी को पढ़ने के लिए अपना बहुमूल्य समय दिया, कहानी को मन से पढ़ा और अपने विचार साझा किये मेरे लिए बड़ी बात है। लिखना सार्थक प्रतीत होता है ऐसी प्रतिक्रिया पा कर. . आपका

आपने सुधार के लिए जो विचार दिए हैं उसके लिए ह्रदय से आभार आपका , कोशिश बहुत रहती है की त्रुटि न हो मगर समय की कमी के कारण बस लिख के पोस्ट कर देती हूँ।
और विशवास कीजिये , मैंने बिलकुल अन्यथा नहीं लिया , प्रसन्नता हुई आपने मेरी अच्छाई के लिए बात कही।

AAGE BHI YUHIN vichaar saajha krti rhe ...
आगे से कोशिश रहेगी की आपके परामर्श को स्मरण रख अच्छा लिखने की
सादर आभार

Meena Bhardwaj ने कहा…

ये अम्माएं बेटियों को गुणवन्त बना ही देती हैं सासों का भय दिखा कर...,आपका यह सृजन बहुत सी बेटियों की व्यथा को उजागर करता है । भागवन्त होना...बहुत बड़ी बात है ईश्वरीय देन ..,जोया जी ये बेटियां अम्माओं के आशीर्वाद से भागवन्त भी बन ही जाएंगी एक दिन ...। बहुत हृदयस्पर्शी और सरस भाषा-शैली में लिखा सृजन जिसमें भाव सीधे हृदय तक पहुँचते हैं ।

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 01 जुलाई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

विश्वमोहन ने कहा…

"ज़िंदगी का बिन्ना पूरी निष्ठा और स्नेह से बिनती गयी। पर हर किसी को बुन्तर पसंद,शायद आये ये ज़रूरी नहीं।" कहानी के अतीत, वर्तमान और भविष्य की सारी बातें बड़ी सहजता से कहते हुए इन पंक्तियों ने पाठकों के मर्म को सहला दिया. बहुत सुगढ़ शिल्प में आपने नारी जीवन ही नहीं बल्कि आम जन के भी सामयिक सच को इस कहानी में इतनी कुशलता से 'बिन्ना' है कि उसके महीन रेशे-दर-रेशे भी साफ-साफ़ झलक रहे हैं.
आभार और बधाई इतनी सुन्दर कहानी का. हाँ, समय मिलने पर इसे आराम से संपादित (बहुत थोडा) कर लीजिएगा.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

अतीत की स्मृतियाँ समेंटे सुन्दर कहानी।

hindiguru ने कहा…

अच्छी कहानी
बहुत बढ़िया ज़ोया जी

Sudha Devrani ने कहा…

माता-पिता अपने बच्चों को गुणवान तो बन सकते हैं पर भाग्य तो विधि के हाथ में है...सही कहा कि सब कुछ करीने से सोचसमझ कर करने के बावजूद भी हर किसी कोवह काम पसंद आये ये जरूरी नहीं.... रिश्तों से सम्मान भी नसीब से ही मिलता है ज्यादातर देखा है जो सबकी सुनता है सबकी खुशी चाहता है गर्म तेल उसी के कानों में पड़ता है।
बहुत ही सुन्दर विचारणीय लाजवाब सृजन....।

Meena Bhardwaj ने कहा…

सादर नमस्कार,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार
(03-07-2020) को
"चाहे आक-अकौआ कह दो,चाहे नाम मदार धरो" (चर्चा अंक-3751)
पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

"मीना भारद्वाज"

दिगम्बर नासवा ने कहा…

भाग का होना अपने हाथ कहाँ होता हिया ... पगलेट को ये बात अम्मा कैसे बताती ...
आंचलिक शब्दों के ताने बाने से खूबसूरत कहानी ... अपने परिवेश में खींच ले जाती है ... बहुत लाजवाब ...

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

Meena ji

आपकी प्रतिक्रिया बहुत शान्ति देने वाले है
अम्माओं के आशीर्वाद से भागवन्त भी बन ही जाएंगी एक दिन ...

हाँ , बनना चाहिए भी , और शायद कुछ प्रतिशत होता भी है , बस यही प्रार्थना है जो प्रतिशत भाग रह आजाता है उनपे प्रभु कृपा करें
स्नेह से भपुर शब्द कहने के लिए से आभार , बहुत हौंसला मिलता है आपके शब्दों से
शुभकमानाओं के साथ आभार

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

यशोधा जी
अपने मेरी कहानी को अपनी चयनित सूची में स्थान दिया , बहुत प्रसन्नता हुई
युहीं हौंसला बढ़ाते रहें
आभार

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

विश्वमोहन जी
कहानी को इतने अच्छे से पढ़ने के लिए आभार , आपकी प्रतिक्रिया से तस्सली होती है की आपने कहानी का मम समझा और कहानी सार्थक हुई
आपकी प्रतिक्रिया बहुत हौंसला बढ़ाती हैं और आप मार्गदर्शन करते उसके लिए ह्रदय से आभ्हर
अच्छा कार्य करने की कोशिश करूंगी

शुभकामनाओं सहित सादर नमस्कार

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी
आपसे प्रतिक्रिया पाना प्रसन्नता का विषय है
आपका आभार

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

hindiguru जी

जाप ब्लॉग तक आये , अपना बहुमूल्य समय कहैं की दिया और सराहा आपका बहुत आभार

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

Sudha devrani जी
बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने प्रतिक्रिया में लिखा उसके लिए। आपने वो मर्म समझा और पकड़ा कहानी का जो कहानी कहना चाहती है जैसा लिखा गया है

बहुत बहुत आभार कहानी को उसकी सार्थकता देने के लिए

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

मीना जी
आप बहुत अच्छी लेखिका है और आपसे अच्छी प्रतिक्रिया पाना और आपकी चयनित सूची में अपनी कहानी को देख कर बहुत ख़ुशी हुई
बहुत बहुत आभार

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

दिगंबर नासवा जी
आपने बहुत स्नेहिल प्रतिक्रिया से अपने विचार रखें है कहानी के प्रति जिससे मुझे अपना लिखना सार्थक लगा

बहुत बहुत आभार आपका
शुभकामनाओं सहित नमस्कार

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

बाल-मन की ऊहापोह और समझदार होने के बाद बिषम स्थितियाँ झेलते नारी मन का मर्मस्पर्शी चित्रण - साधुवाद स्वीकारें!

Anita ने कहा…

दिल को छूने वाली कहानी ! काश ! आज की पीढ़ी को भी ऐसी ही सीख मिले

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत कहानी ..जीवन के एक सबसे बड़े और जरूरी पाठ को जो आज दुर्लभ है , सिखाती है कि सीखना कला कुशल होना जीवन को सम्पन्न बनाता है दास या दरिद्र नहीं . सास का डर दिखाकर अम्मा ने सब सिखा दिया . सीखना आसान नहीं होता इसलिये बिना कठोरता के ..कठोरता अपने लिये , सिखाने वाले के लिये जरूरी है . गुरुजी के डर से याद किये पाठ अभी तक याद हैं हमें . डर यानी अनुशासन . और हाँ गुणी व्यक्ति भागवन्त हो या न हो पर जीवन को सुन्दर बनाना उसे आता है .

Kamini Sinha ने कहा…

" मैंने रिश्तों का हर बिन्ना बहुत निष्ठा, प्रेम और परिश्रम से बुना, लगाव की कोडियां सजायीं, स्नेह और प्रेम के रंग-बिरंगे धागे से इक-इक तिनका जोड़-जोड़ आगे बीना, समर्पण, सत्कार, हर तरह के घुँघरू लगाए, बहुत प्यार से सहेजा, सब किया।
मगर मेरे कानों में रह-रह के तेल पड़ता है अम्मा और वो भी गरम तिल का तेल। और अब तो मुझे भी बहुत कम सुनाई देता है अम्मा।"
नारी मन के हर उम्र की उलझन को उकेर दिया आपने जोया जी,सही कहा आपने-अम्मा की सीख और सासु माँ के डर ने सब कुछ सीखा दिया,
अम्मा ने "गुणवंता" तो बना दिया पर "भागावंत" बनना तो अम्मा को भी नहीं आता था कहा से सिखाती बेचारी।
बेहद मर्मस्पर्शी,एक एक शब्द दिल को छू गए,सादर नमन आपको

अनीता सैनी ने कहा…

निशब्द हूँ आदरणीय दी आपकी कहानी पढ़कर सही कहा गुणवान होना हाथ में है भाग्यवान होना नहीं.आँचलिक शब्दों के साथ भावों का गहनता से ताना बाना बुना है.
लाजवाब

VenuS "ज़ोया" ने कहा…


प्रतिभा सक्सेना जी

आपने बहुत हो स्नेहिल और कहानी को सार्थकता देने वाली प्रतिक्रिया दी हैं
आप ब्लॉग टाक आयी, कहानी को पढ़ा ,सराह कर हौंसला बढ़ाया आपका हृदय से आभार

शुभकामनाओं सहित सादर नमन

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

अनीता जी

आप ब्लॉग तक आयी, कहानी को पढ़ा ,सराह कर हौंसला बढ़ाया आपका हृदय से आभार

शुभकामनाओं सहित सादर नमन

VenuS "ज़ोया" ने कहा…


गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी
आहा ! आपने कहानी का मर्म इतने गहरे से समझा और अपने भाव रखे मुझे मेरी कहानी लिखना सार्थक लगा। गुणी वयक्ति अपने जीवन का अच्छा बना ही लेता है , सही कहा आपने

कहानी को इतनी सहजता से पढ़ने के लिए आभार
शुभकामनाओं साहित नमस्कार

VenuS "ज़ोया" ने कहा…


Kamini Sinha जी

सही कहा आपने अम्माओं हमे गुणवान बना लेती हैं , भागों वाला बनाना तो उनके हाथों में नहीं।
आपने कहानी के मर्म को समझा , कहानी के टेल छुपे अर्थ को पढ़ा और अपने भाव साझा किये आपका बहुत बहुत आभार


शुभकामनाओ सहित नमन

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

अनीता सैनी जी

आपसे ऐसे उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया पाना प्रसन्नता देता है , आपका बहुत बहुत आभार

शुभकामनाओ सहित नमन