गुरुवार, जुलाई 16, 2020

गुरुत्वाकर्षण


कल रात यूँ हुआ, हाथ जा चाँद से टकरा गया,
तुम्हे छूने की चाह में, हाथ झुलस के रह गया। 

दूर जाते - जाते ये तुम कितनी दूर निकल गए !


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मैं पृथ्वी सी घूमती दिन-रात अपनी धुरी पे युगों से, 
तुम चाँद सा दूर मगर फिर भी मुझसे सदा बँधे से। 

क्या तुम्हारे और मेरे बीच भी कोई गुरुत्वाकर्षण है?

   

  ज़ोया****
#ज़ोया

pc@Googleimages

9 टिप्‍पणियां:

रेणु ने कहा…

, तुम चाँद सा दूर मगर फिर भी मुझसे सदा बँधे से। ! क्या बात है ! बहुत खूब ज़ोया जी |

रेणु ने कहा…

तुम चाँद से दूर शायद ज्यादा सही होगा |

रेणु ने कहा…

विनम्र आग्रह है , अप्रूवल की शर्त हटायें ज़ोया जी |

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर।
उत्तम शब्द चयन।

दिव्या अग्रवाल ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 17 जुलाई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार (१८-०७-२०२०) को 'साधारण जीवन अपनाना' (चर्चा अंक-३७६६) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
--
अनीता सैनी

Meena Bhardwaj ने कहा…

प्राणियों में मोह का गुरूत्वाकर्षण ही तो है जो बाँधे रखता है हमें एक दूसरे से ..हृदयस्पर्शी गंभीर चिन्तन।बहुत खूबसूरत सृजन जोया जी ।

hindiguru ने कहा…

बढ़िया रचना

Cbu ने कहा…

Aai aai oooo KB humesha :)