सोमवार, फ़रवरी 07, 2011

दिल है छोटा सा..छोटी बड़ी बातें


 ****** 
तुम भी मेरी किस्मत से ही मिले  हो मुझे 
जब देखो दिल की तरह जलते बुझते रहते हो
कभी ख़ुशी की तरह आना जाना करते हो
कभी गम की तरह देर तक बैठे रहते हो
कभी उम्मीद सा छा  जाते हो ज़ेहन ओ दिल पे 
कभी नाकामियों की तरह दिल दुखा जाते हो 
तुम भी मेरी किस्मत से ही मिले  हो मुझे
******
ले दे के इक अपनी ये
किस्मत ही बची है 'यारो'
जितना मर्ज़ी कोस लूँ इस ढीठ   को
ना मेरी पेशानी से उठ के जाती है
ना कभी पीछा ही छोड़ती है मेरा  
कुछ अहबाब ऐसे हैं देखे मैंने  
इक बस सग़ीर से मसले पे 
दिल ओ जीस्त से उठ के चले गये
******
क्यूँ कर 'ए खुदा' इंसान होने के
इलज़ाम दे दिया तुने  मुझे  
मैं इक बिखरी सी नज़्म ही भली थी
"गुलज़ार" के पन्नो पे
जब से "गुलज़ार" के हाथों से छूटी  हूं  
ना तंजीम बैठती है मुझपे कोई
ना ही कोई तरतीब
तब से मुन्तशिर हूं बेइख़्तियार हूं
काश ! इक बिखरी सी नज़्म ही रहती  मैं
"गुलज़ार"  के पन्नो पे !

 ******

पेशानी - forehead ;; अहबाब  - dear ones
सग़ीर  - minor.small ;;  जीस्त - life
तंजीम - composing verse  ;; तरतीब - arrangemnets
मुन्तशिर - in disarray  ;;  बेइख़्तियार - without control






9 टिप्‍पणियां:

यशवन्त माथुर ने कहा…

बहुत खूब जोया जी.

सोमेश सक्सेना ने कहा…

आपकी ये बिखरी हुई नज़्म होने की कामना पसंद आई. अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर.

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

लाजवाब.......बहुत ही सुंदर रचना जोया जी।

sagebob ने कहा…

बहुत उम्दा,zoyaa jee.
'कभी ख़ुशी की तरह आना जाना करते हो
कभी गम की तरह देर तक बैठे रहते हो'
और
'कुछ अहबाब ऐसे हैं देखे मैंने
इक बस सग़ीर से मसले पे
दिल ओ जीस्त से उठ के चले गये'
और
'तब से मुन्तशिर हूं बेइख़्तियार हूं
काश ! इक बिखरी सी नज़्म ही रहती मैं
"गुलज़ार" के पन्नो पे !'

आपकी कलम को सलाम

कौशलेन्द्र ने कहा…

जोया आ आ आ आ ! खूबसूरत ...इस बार फिर सिक्स ..! तीनों ही नज्में बेहतरीन .......बधाई दो मुझे ....क्योंकि ये तुमने लिखी हैं ....मेरी रानी बेटी ने.

इमरान अंसारी ने कहा…

जोया जी,

बहुत खुबसूरत नज्मे....एक जगह ढीट की जगह ढीठ होना चाहिए था.....

आखिरी वाली नज़्म में आपकी गुलज़ार साहब के प्रति श्रद्धा झलकती है.....बहुत खूब |

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

सभी शब्दचिभ बहुत ही मखमली हैं!
बसन्तपञ्चमी की शुभकामनाएँ!

saanjh ने कहा…

काश ! इक बिखरी सी नज़्म ही रहती मैं
"गुलज़ार" के पन्नो पे !

aah....!

kya kahoon...mere dil ki puraani khwahish ko apni nazm bana diya aapne....simply awesome....beyond words

संजय भास्कर ने कहा…

आदरणीय जोया जी
नमस्कार !
..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती