शुक्रवार, जून 03, 2011

रात चाँद और मैं ...गुलज़ार साहब


आज गुलज़ार साहब की कलम से निकला इक नायब मोती ले के आई हूँ...उम्मीद हे आप सब को पसंद आयेगा ....




उस रात बहुत सन्नाटा था
उस रात बहुत खामोशी थी
साया था कोई ना सरगोशी
आहट थी ना जुम्बिश थी कोई
आँख देर तलक उस रात मगर
बस इक मकान की दूसरी मंजिल पर
इक रोशन खिड़की और इक चाँद फलक पर
इक दूजे को टिकटिकी बांधे तकते रहे

रात  चाँद  और  मैं  तीनो  ही  बंजारे  हैं
तेरी  नम  पलकों  में  शाम  किया  करते  हैं  
  

कुछ  ऐसी  एहतियात  से  निकला  है  चाँद  फिर
जैसे  अँधेरी  रात  में  खिड़की  पे  आओ   तुम  

क्या  चाँद  और  ज़मीन   में  भी  कोई  खिंचाव  है
 
  
सितारे  चाँद  की  कश्ती  में  रात  लाती  है
सहर   में  आने  से  पहले  बिक  भी  जाते  हैं

बहुत  ही  अच्छा  है  व्यापार  इन  दिनों  शब  का  




 बस  इक  पानी  की  आवाज़  लपलपाती   है
की  घाट छोड़  के  माझी   तमामा  जा   भी  चुके  हैं 

चलो  ना  चाँद  की  कश्ती  में  झील  पार  करें


रात  चाँद  और  मैं अक्सर  ठंडी  झीलों   को
 डूब  कर  ठंडे  पानी  में  पार  किया  करते  हैं
                                                                             -: गुलज़ार साहब 

16 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

एक अलग ही अह्सास मे डुबा दिया……………आभार्।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

गुलज़ार साहब की इस बेहतरीन रचना को हम सब से साझा करने के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

सादर

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (04.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)
स्पेशल काव्यमयी चर्चाः-“चाहत” (आरती झा)

Kailash C Sharma ने कहा…

एक बेहतरीन रचना पढवाने के लिये आभार...

anupama's sukrity ! ने कहा…

khoobsoorat ehsaas.
http://anupamassukrity.blogspot.com/2011/

कुश्वंश ने कहा…

एक बेहतरीन रचना पढवाने के लिये आभार...

सैयद | Syed ने कहा…

गुलज़ार साहब को पढना एक अलग ही अहसास है... बहुत शुक्रिया.

सैयद | Syed ने कहा…

गुलज़ार साहब को पढना एक अलग ही अहसास है... बहुत शुक्रिया.

Udan Tashtari ने कहा…

आभार इसे पढ़वाने का....बहुत खूब.

Vaanbhatt ने कहा…

गुलज़ार साहब का क्या कहना...

prerna argal ने कहा…

guljaar sahab ki to her rachanaa laajabab hoti hai itni achchi rachanaa se rubaroo karane ke liye dhanyawaad.aek khubsoorat ahesaas main doobone ke liye shukriyaa.



please visit my blog.thanks.

इमरान अंसारी ने कहा…

गुलज़ार साहब की तो बात ही अलग है......वो सबसे अलग हटकर लिखते हैं.....पर आपकी कलम में भी उनका गुमां बना रहता है ......शुक्रिया बांटने के लिए|

saanjh ने कहा…

ye to poora album hi behtareen hai....aur in nazmon ko khud gulzar ki awaaz mein sun'na....its intoxicating.....!!!

abhi ने कहा…

सब के सब बेहतरीन...सब के सब कैद हैं मेरी डायरी में...:)

dixit ने कहा…

रात चाँद और मैं तीनो ही बंजारे हैं
तेरी नम पलकों में शाम किया करते हैं

bahut khoob...!! ye hain gulzaar...!!
veenus ji aabhaar..!!

दिपाली "आब" ने कहा…

उस रात बहुत सन्नाटा था
उस रात बहुत खामोशी थी
साया था कोई, ना सरगोशी
आहट थी, ना जुम्बिश थी(hi) कोई
आँख(haan) देर तलक उस रात मगर
बस इक मकान की दूसरी मंजिल पर
इक रोशन खिड़की और इक चाँद फलक पर
इक दूजे को टिकटिकी बांधे तकते रहे

रात चाँद और मैं तीनो ही बंजारे हैं
तेरी नम पलकों में शाम किया करते हैं


कुछ ऐसी एहतियात से निकला है चाँद फिर
जैसे अँधेरी रात में खिड़की पे आओ तुम

क्या चाँद और ज़मीन में भी कोई खिंचाव है (i love dis one) and the ways chacha jaan has recited..commendable

सितारे चाँद की कश्ती में रात लाती है
सहर में आने से पहले बिक भी जाते हैं

बहुत ही अच्छा है व्यापार इन दिनों शब का



बस इक पानी की आवाज़ लपलपाती है
की घात(ghaat) छोड़ के माझी तमाम जा भी चुके हैं

चलो ना चाँद की कश्ती में झील पार करें


रात चाँद और मैं अक्सर ठंडी झीलों को
डूब कर ठंडे पानी में पार किया करते हैं
kuch chhoti chhoti mistakes hain theek kar di hain :))