शनिवार, अगस्त 31, 2019

ठंडी चाय !


अभी ताले में चाबी डाली ही थी, की मोबाइल बजने लगा  उफ़्फ़ ! कौन होगा इस वक़्त। पहले सोचा के देखूं, पर थकान इतनी थी की सोचा आराम से अंदर बैठ के देखती हूँ उपर से ये मोबाइल भी ना जाने कहाँ हैं, एक तो बैग में इतना समान पड़ा रहता है कि कुछ समान ढूढ़ने के लिए अच्छी-ख़ासी मशक्कत करनी पड़ती है। 

ओ हो ।  अम्मा का फोन। कितनी बार कहा है शाम को 8 ..साढे 8 बजे के बाद ही फ़ोन किया करो, पर नही, बात तो सुननी ही नहीं है , हम्म्म्म, पर बेचारी परेशान होंगी।  नंबर डाईल करने लगी और फिर काट दिया। जानती हूँ क्या ज़रुरी बात होगी अम्मा की। पहले आराम से फ्रेश हो लूँ ज़रा, चैन से बैठ के फिर बात करती हूँ 

सच ..क्या जादू है पानी में, इसकी शीतलता से पुरे दिन की थकान बह जाती है धड़ाम से सोफे पे गिरी, दिन भर के बाद जी करता है कि बस यही सो जाऊँअपने हाथ की बनी इक कप चाय मिल जाए बस अभी! चाय बनाने के लिए उठने लगी ही थी के ख्याल आया।  उफ़्फ़,  अम्मा को फोन भी तो करना है। 

 दूसरी तरफ से वही कांपती हुई आवाज़ आई, "हेल्ल्ल्लो"
अम्मा कैसे बोलती है हेल्लो ..........उम्र अब आवाज़ में झलकने लगी है 

''हाँ अम्मा, मैं बोल रही हूँ..... फ़ोन किया था ..

"अरी लाडो, पहले नहीं उठाया फोन, कहाँ थी, कब पहुँची ऊनिर्सिटी से, सब ठीक है ना, तबियत कैसे है, खाना खाती है समे पर, सेहत का ध्यान रखा कर, खा पी लिया कर कुछ, पूरा दिन भागती-दौड़ती रहती है, फ़िक्र लगी रहती है तेरी

"जवाब भी दूँ के सवाल ही करोगी और ऊनिर्सिटी, इतने साल हो गए, अभी भी ऊनिर्सिटी, बोलो यूनिवर्सिटी।  

और फिर दोनों ज़ोर से हँसीं। कितना खनखनाके हँसती है अम्मा और मैं अम्मा के साथ। 

"सब ठीक ठाक है अम्मा .....खूब खा पी रही हूँ...खूब मोटी ताज़ी हूँ। तुम बताओ क्या हाल चाल हैं। मुझे समझाती रहती हो, अपना ख्याल तो रखा नहीं जाता, कब से कह रही हूँ यहाँ आ जाओ मेरे पास। पर नहीं हर बार वापिस भेज देती हो मुझे। उस ज़मीन पे बैठी रहो, ना जाने कब समझ आएगी मेरी बात, जहाँ जिंदगी हो वहाँ रहो। ज़मीन के टुकड़ों के पीछे जिंदगी जमाये बैठी हो ""

बीच में ही अम्मा बोल उठी, "अच्छा, ये बता कैसी है?


"ठीक हूँ अम्मा। .. सब ठीक है, काम अच्छा चल रहा" अपना बताओ कैसी हो?
बिटिया इक बात कहने के लिए फ़ोन किया था...और फिर चुप हो गयी....चुप्पी तोड़ते हुए बोली, 

""अच्छा ! मेरी अच्छी बेटी बनके बात सुन ले। वो, ह्म्म्म ...नीलेश का फोन आया था। पहले तो उसकी माँ से ही बात हुई। बहुत भली हैं। फिर उसने भी बात की, बड़ा अच्छा लडका है, लोग भी बहुत भले हैं, कितना मान देते हैं तुझे। और वो नीलेश .....वो तो कब से कह रहा है। मैं तुझे समझा समझा के थक गयी हूँ। मैं कब तक रहने वाली हूँ तेरे साथ। मेरे बाद तुने वैसी ही किसी की नहीं सुननी। उम्र बहुत लम्बी होती है लाडो ..........."

अक्सर सोचती हूँ की अम्मा मेरी लिए परेशान होती है या अपनी परेशानी से दुखी। अपने एकाकी जीवन का भार उनकी आँखोंसे..आवाज़ से साफ़ झलकता था। उसी भार के तले मेरे दबने का डर सताता होगा शायद

अम्मा की आवाज़ ने मुझे मेरी सोच से बाहर निकाला। 

"अभी परसों रम्मी आई थी, तीसरा बच्चा हुआ है उसे, देख तुझसे 7 साल छोटी है। जितनी जल्दी जिन्दगी बसे उतना अच्छा

""ये क्या लॉजिक हुआ भला ..अगर उसके 3  बच्चे हैं तो मैं क्या करूं.....अब 18 साल में उसने शादी कर ली .... तो मेरी क्या गलती है?.....हद है .....इसी रफ़्तार में लगी रही ... तो मेरी उम्र तक 10 बच्चे भी हो जायेंगे

और फिर जो मैं और अम्मा हँसी के आँखों में पानी ही आ गया।

पर अगले ही पल, इक सर्द आह महसूस की मैंने अम्मा की आवाज़ में....जैसी इक बर्फ की तह सी जम गयी हो उनके गले में।

""कब तक यूँ हँसती रहेगी ...जानती हूँ तू बात को समझती है। पर मैं अपना क्या करूं, जी नही मानता, मरने से पहले तुझे जोड़े में देख लूँ तो स्वर्ग मिल जायेगा। वरना शान्ति ना मिलेगी मुझे 

आखिरी शब्द साफ़ से सुनाई भी नहीं दिए ज्यूँ गला पकड़ लिया हो किसी ने..

"हाँ हाँ ..रो पड़ो.....बस अम्मा ऎसी बातें कर के मुझे इमोशनल कर लो, बस यही आखिरी हथियार है तुम्हारे पास मेरे लिए। ठीक है, ठीक है...जैसा तुम बोलो, वही करुँगी, ठीक है"।

"मैं तेरी ये बात ना जाने कब से सुन रही  हूँ। मैं तेरी ख़ुशी ही तो चाहती हूँ...नीलेश के बारे में सोच ले......बेटा... कितना मान देता है। तेरी खुशी में ही मेरे जान प्राण बसे हैं। बस, तुझे जोड़े में देख लूँ, फिर मैं भी विदा लूँ 

"बस करो अब ये....कहा ना ..जो बोलोगी वही....अब ये इमोशनल अत्याचार बंद करो ...और सुनाओ, रम्मी का तीसरा बच्चा कैसा है.""

और फिर इक ज़ोरदार ठहाका

"बस .मुझे ही सताया कर 

" तो और क्या करूँ अम्मा "

सुन ...जो चला गया उसे जाने दे। ..वि...

जुबान पर आते-आते नाम अटक गया हो जैसे। फिर वो चुप हो गयीं। इतने सालों हुए, पर अभी भी वो नाम इतना भारी है, जुबां उठाती ही नहीं। पर इतने सालों ने मुझे अब खुद को संभालना और समेटना सीखा दिया है। आगे कुछ मुझसे भी नहीं कहा गया। अम्मा भी समझ गयी। अब तक मेरी हर बात बिना कहे जो समझी है।

"लाडो, जो सही हो, वो हमेशा अच्छा होता है। ज़रूरतों और समे के साथ जिंदगी के फैसले लेने चाहिए फ़ैसलों पर ही आगे की जिंदगी निर्भर करती है

अम्मा से बात करते-करते कब डेढ़ घँटे बीते, पता ही नहीं चला। घड़ी देखी 10:30 हो रहे थे.......हद है! बस, अम्मा जब फोन करती है, वक़्त ऐसे ही भागता है। चाय तक नहीं पी। चाय की तलब अब सर चढ़ने लगी थी। अदरक और चायपत्ति डाल, पानी गैस पे चढाया और सोच खुद ब खुद सर चढ़ गयी। 

नीलेश, ह्म्म्म्म्म ! इसे भी 2 -3 महीने बाद ना जाने क्या दौरा पड़ जाता है। सीधा अम्मा को उठा के फोन, ह्म्म्म्म्म! पर अम्मा से उसका जुड़ाव महसूस किया है मैंने। 

ओ हो !! चाय का पानी उबल उबल के इक तिहाई रह गया । चाय का ये गहरा भूरा मैरूनिश सा रंग कितना प्यारा लगता है। और ये खुशबू..उफ़्फ़ ............  इक बिन बुलाई मुस्कान जाने खुद होंठों पर आ बैठी। 

                                                                    तुम्हे भी तो कितना पसंद था ना ये रंग। भूरा मैरूनिश सा रंग। और चाय की मदहोश कर देने वाली  खुशबू.... हम्म्म। अक्सर चाय बनाते वक़्त चाय के बदलते रंगों को देखना कितना पसंद था हमें। चाय के पानी में जब, सफ़ेद दूध डलता तो वो रंगों का घुलना, फिर वो बादामी सा रंग बनते देखना। कैसे निहारा करते थे। तुमने इन्ही रंगो को देख के मुझे वो सूट दिया था और कहा था, "ये हमारा चाय वाला सूट है"  कितना हँसे थे उसके नामकरण पर। अच्छे से उबले चायपानी के भूरे मैरूनिश रंग के साथ उस सफ़ेद दुपट्टे के कॉम्बिनेशन पर मर मिटी थी मैं

" क्या choice है " जैसे ही मैंने कहा, फटाक से बोले , "हाँ , वो तो है ही ...खुद को नही देखा कभीमैंने भँवें सिकोड़ीं भर तो बोले, ' अब मधुमक्खी  की तरहा मेरे पीछे मत पड़ जाना। तारीफ तो हज़म ही नहीं होती तुम्हे। अब घूरना बंद कर के, जल्दी से पहन के दिखाओ, देखूँ कैसा लगता है''  

अभी आईने में वो सूट पहने खुद को देख ही रही थी कि तुमने इक गहरी सी साँस छोड़ते हुए कहा, "हाय ! मुझे चाय बहुत पसंद है"  और हल्के से आँख मार दी। मुझे शर्माते देख बोले, "अरे ,चाय का तो बादामी रंग होता है तुम्हारा रंग तो रुह- ह्फ्ज़ा सा हो रहा है"। तुम्हे यूँ बच्चों सा खिलखिलाते हँसते देख, मैं भूल ही गयी की मुझे इस बात पर चिढ़ना है।  

अरे अरे अरे... सारी चाय उबल गयी....बस जरा सा सोच में क्या डूब जाऊं, वर्तमान ऐसे लगता है, मानो ठहर गया हो, पर असल में वो भविष्य की तरफ भाग रहा होता है। ना जाने अतीत के पलों में हँसते-हँसते कहाँ से इक आंसू फिर छलक के बाहर आ गया। मुझे अक्सर लगता है की वो आँसू मुझसे कह रहा हो, "इतने ज़ोर से ना हँसा करो.....दवाब से मैं बाहर आ गिरता हूँ। । फिर से चाय बनायी,  मग में डाल खिड़की पे आ बैठी। घूँट -घूँट के साथ सोच ना जाने कितने रंग बदलने लगी।

'टिंग-टिंग' मैसेज की ट्यून ने सोच तोड़ी 
Hey ..whats happening .... अभी बात कर सकती हो ?... .....

नीलेश  ..ह्म्म्मम्म 

"Hi ...कैसी हो"  नीलेश  की वही सौम्य, अफेक्शन से भरी आवाज़"मैंने अम्मा से बात की थी आज, सोचा तुम्हे बता दूँ......आज बहुत लेट आयी घर लगता है। कैसे रहा दिन .. .... ........ ........ ........ ............ ......

नीलेश अच्छा दोस्त ही नहीं इक अच्छा इंसान भी है। कितनी मर्तबा इतनी देर रात बात की मगर कभी मर्यादा की सीमा परे कुछ नहीं कहा। जाने क्यों सहन करता है मुझे...मेरी बेरुखी को..इतने वक़्त से और वो भी बिन जताये।  हम्म........सब कुछ जानने के बावज़ूद भी।

ओ हेल्लो। ..सो गयीं क्या। ..कहाँ ग़ुम  हो मैडम? आदतन खिड़की पर बैठी होंगी चाय का मग ले कर ..  गिर मत जाइयो निचे . .बहुत उधार बकाया है अभी।  

उफ़्फ़्फ़! वो बोल रहा हैं और मैं अपनी ही सोच की लहरों में गोते लगा रही हूँ। मुझे स्माइल करवाने में उसे महारत हासिल हो चुकी है अब तक और मुझे हँसाना जैसे डेली टारगेट हो उसका। 


मेरी हल्की सी हंसी सुन के वो कुछ खामोश सा हुआ और इक सांस भर के बोला  .. 

"चलो, बहुत थकी सी लग रही हो। ... .सोओ तुम अभी, कल मिलते हैं O.K" !


फ़ोन रखते ही, अम्मा की  उस आह की ठंडक मुझे अपनी साँसों में महसूस हुई बेख्याली में मग साइड पे रख के उठ खडी हुई। अलमारी से वही सूट निकाला। जाने कब से पहना ही नहीं। दुधिया सफ़ेद दुपट्टा उस गहरे भूरे मैरूनिश रंग से मिल कर भी बादामी रंग नहीं बना पा रहा था। 
शायद चाय की तरह ताप से अच्छे से घुल मिल के पकता, तभी मनचाही रंगत आती। कब से ये सूट यूँहीं पड़ा है। इक लड़की देखी थी इक दिन सड़क पर, बड़ी मुश्किल से अपना तन ढक पा रही थी। उसे दे आऊँगी, किसी के काम तो आयेगा ये।

घड़ी पे नज़र डाली ...हद है...12  बजने वाले हो गए। ना कुछ खाया, न कुछ पीया, ना कुछ काम-धाम। कल जाते ही गाइड पूछेगी रिपोट्स पर काम किया ..फिर फलाना धिम्काना। अम्मा की बच्ची ! जिस दिन बात छेड़ देती है, उस दिन यही होता है।

उफ़्फ़्फ़ ....अरे ! चाय फिर से ठंडी हो गयी।

ठंडी चाय का रंग बिलकुल दिलकश नहीं लगता और बासी सी स्मेल। गर्म करने पे सेहत के लिए ठीक नहीं रहती, स्वाद भी कुछ कसेला हो जाता है ......जैसे रुके हुए रिश्ते। 

ठंडी चाय फेंक के ... ढूध गर्म होने रखा। अम्मा भी अक्सर यही कहती है ..''ये सेहत के लिए अच्छा है। रंगों से ही जिंदगी नहीं चलती''  


ठंडी चाय धीरे धीरे सिंक से बह के उतर गयी....बस उसका हल्का-हल्का सा निशाँ बाकी है।

ज़ोया
 Oct 7, 2008

#ज़ोया

10 टिप्‍पणियां:

Enoxo ने कहा…

" विडीओ ब्लॉग पंच में आपके एक ब्लॉगपोस्ट की शानदार चर्चा विडीओ ब्लॉग पंच 5 के एपिसोड में की गई है । "

" जिसमे हमने 5 ब्लॉग लिंक पर चर्चा की है और उसमें से बेस्ट ब्लॉग चुना जाएगा , याद रहे पाठको के द्वारा वहाँ पर की गई कमेंट के आधार पर ही बेस्ट ब्लॉग पंच चुना जाएगा । "

" आपको बताना हमारा फर्ज है की चर्चा की गई 5 लिंक में से एक ब्लॉग आपका भी है । तो कीजिये अपनो के साथ इस वीडियो ब्लॉग की लिंक शेयर और जीतिए बेस्ट ब्लॉगर का ब्लॉग पंच "

" ब्लॉग पंच का उद्देश्य मात्र यही है कि आपके ब्लॉग पर अधिक पाठक आये और अच्छे पाठको को अच्छी पोस्ट पढ़ने मीले । "

विडीओ ब्लॉग पंच 4 के एपिसोड में आपने देखा
विडीओ ब्लॉग पंच 4

विडीओ ब्लॉग पंच 5 की चर्चा हमने हमारे ब्लॉग पर भी की है शून्य में शून्य और विडीओ ब्लॉग पंच 5

एक बार पधारकर आपकी अमूल्य कमेंट जरूर दे

आपका अपना
Enoxo multimedia

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

Enoxo multimedia

बहुत आभार आपका लम्बी कहानी को वक़्त देना मुश्किल होता है  और अपने तो इसे अपने ब्लॉग में स्थान भी  बहुत बहुत आभार आपका ब्लॉग तक आने। ..कहानी को वक़्त देने और सराहना भरे शब्दों के लिए धन्यवाद 

Meena Bhardwaj ने कहा…

मन्त्रमुग्ध कर दिया आपकी कहानी ने...जितनी अच्छी कविता लिखती हैं आप उतनी ही अच्छी कहानी भी । बहुत सुन्दर ।

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

Meena JI

Hmmmm...lmbi kahaani pdhne ke liye wat nikaalna pdhtaa he...wo bhi aajkal ki waysat zindgi me se......

aapne ...mujhe is kaabil smjhaaa ...bahut bahut aabhaar
tah e dil se shukriyaa ..ani zindgi ke kuch mehtwapooran lmhe mere liye nikaalne ke liye


stay blessed

Meena Bhardwaj ने कहा…

Joya ji aap bahut achchha likhati hain. Aur yah kahaani bahut.. bahut achchhi hai . Chai ka mehrunish ya Badami rang bahut bhaaya mujhe .

संजय भास्‍कर ने कहा…

अम्मा जब फोन करती है, वक़्त ऐसे ही भागता है ....अम्मा होती ही ऐसी है .... हमेशा ही होता जब भी अम्मा से बात होती वक्त तेज गति से भागता है .....पर अम्मा भी अक्सर यही कहती है...जो कहती है उसका कोई मतलब होता है इसलिए हमे आम की हर बात पर ध्यान देना चाहिए........नाज़ुक एहसासों को लिख डाला आपने...जोया जी

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

Meena ji

ooohh...sach me..bahut bahut khushii ho rhii he ki..sach me aapko kahaan acchi likhi

likhnaa saarthak huyaa....

sach me..bahut bahut shukiryaa apko...utsaah se bhar uthi he meri kalam...

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

संजय ji



:)

bahut bahut dhanywaad aapkaa

bahut saal pehle likhi thi...pr kabhi post krne ki himmat nhi hui....bas us din achnak ..nazar odhi to socha ..post kr dun..pr hichkichaa rhi thi..kon itni lmbi kahaani pdhnega...

bahut bahut dhnaywad apkaa

Hindi Quotes ने कहा…

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Simran Sharma ने कहा…

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