कुछ हफ्ते पहले हफ़्तों लगा के लिखी थी
वो नज़्म, देखा लड़खड़ा के चल रही थी
उसीके आगे सुस्त चाल चल रही थी
इक ग़ज़ल कुछ दिन पहले जो लिखी थी
त्रिवेनियाँ भी चला रही हैं काम किसी तरह
पर हालत इतनी खस्ता थी की क्या कहुँ
सोच में डूबी रही हफ़्तों इन्हें हुआ क्या है
जहाँ तहां गिरी पड़ी हैं ,लंगड़ा के चलती हैं
कुछ तो हुआ है इन्हें, जाने पर हुआ क्या है
पोटली निकाली पुरानी नज्मों ग़ज़लों की
इक - इक पलट - पलट के देखी, पढी
और बात समझ में आ गयी
मुस्कुरा के रख दी पोटली वापिस मैंने
वही लफ़्ज़, वही कलम, वही मैं
सब कुछ वही तो था, ना था तो बस
सिर्फ इक शब्द
जो उन सब ग़ज़लों नज्मों में बसा था
सिर्फ इक शब्द
वो इक शब्द जो अब मेरी सोच में नहीं
मेरी नज्मों में नहीं मेरी ग़ज़लों में नहीं
मेरी कलम में नहीं, मेरी सयाही में नहीं
शायद वो "अब" मेरी जिंदगी में नहीं
वो इक शब्द जो मेरी कलम को अक्सर
खून में दर्द की सियाही मिला-२ पिलाता
और फिर दर्द ही दर्द हर हर्फ़ में उभर आता
बस ...सिर्फ इक उसी शब्द के न होने से
कलम खून की कमी से लड़खड़ा रही है
सिर्फ इक शब्द...................."तुम" !
ज़ोया****
penned on "Mar 21 ,2010"
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