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गुरुवार, जुलाई 16, 2020

गुरुत्वाकर्षण


कल रात यूँ हुआ, हाथ जा चाँद से टकरा गया,
तुम्हे छूने की चाह में, हाथ झुलस के रह गया। 

दूर जाते - जाते ये तुम कितनी दूर निकल गए !


*
  *  
*
*



मैं पृथ्वी सी घूमती दिन-रात अपनी धुरी पे युगों से, 
तुम चाँद सा दूर मगर फिर भी मुझसे सदा बँधे से। 

क्या तुम्हारे और मेरे बीच भी कोई गुरुत्वाकर्षण है?

   

  ज़ोया****
#ज़ोया

pc@Googleimages

सोमवार, जून 29, 2020

अर्धचंद्र !


याद है इक दिन युहीं बैठे-बैठे
मेरी दाहिनी बाज़ू के पीछे 
तुमने इक अर्धचंद्र बनाया था 
सालों हुए 
चाँद तो कबका अस्त हो चूका ! 
पर काली अमावस अब भी 
क्रमबद्ध 
हर पंद्रह दिन बाद आ ही जाती है !

  ज़ोया****

शनिवार, फ़रवरी 29, 2020

किसी सुबह अंकुरित हो ही जाएगा




मुद्दतों से खारे पानी से  भिगो
चांदनी के नरम कपड़े में लपेट
दिल की लाल गर्म कटोरी में रखा है 
आस का चाँद
किसी सुबह अंकुरित हो ही जाएगा,
फुट आये शायद उसमे नया चाँद कोई 
शायद आस में नवप्राण पड़ ही जाएँ 

पुराने चाँद से तोड़ 
उम्मीदों की पोटली के इक कोने में
संभाल के रख लुंगी उस अंकुरित आस को

जब भी भूखो मरने लगेगी 
उम्मीद कोई फिर आदतन, 
तोड़ के इक टुकड़ा उस चाँद का 
निवाला बना निगल जाऊँगी  
शायद ऐसे ही कर 
भूखी उम्मीदों का पेट भर पाउंगी ! 

मुद्दतें हुईं भिगो के रखा है आस का चाँद
किसी सुबह अंकुरित हो ही जाएगा

:-ज़ोया 
                                                                                                                                                         #ज़ोया 



मंगलवार, अक्टूबर 15, 2019

'' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !''


धुल जम चुकी है चाँद पे क्या ?
या सिलबट्टे पे खुद को घिसता रहता है?
ना जाने ये चाँद क्यूँ रातों में अक्सर 
कतरा-कतरा मुझपे गिरता रहता है? 
मुंह बिचकाये रहता है, और
कहता है-'तुमने मुझको छोड़ दिया
उतर आई हो खुद ज़मीन पे, और
 मुझको ऊपर तन्हा छोड़ दिया
सालों का था याराना अपना
तुमने चंद रस्मों में तोड़ दिया।

कहा था मुझसे इन सितारों ने 
समझाया था रात के गलियारों ने 
    '' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !''
इक बार तुमने भी तो
 आंसूं पिरोते कहा था ना मुझसे
 '' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !''
वक़्त पड़े, तुम्हारे हो गए  
वक़्त पलटे तो पलट गए  
ठीक ही कहा था तुमने मुझसे 
 '' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !''

इक वक़्त वो भी था जब तुम, 
अक्सर मेरी गोद में सोतीं थीं 
पहरों बातें करती थीं मुझसे 
आँख मिचौली खेला करतीं थीं
आंसू पिरो के देती थीं तुम मुझको
मैं माला पहन कितना इतराता था
तुम नज़्मे-नगमे लिखती रातों को
और मैं पौ फटे तक सुनता था।

और आज ये दिन है देखो तो 
तुम वहां ज़मीन पे सोती हो, 
ना बातें करती हो मुझसे 
ना आँख मिचौली खेला करती हो। 
रहती हो मुझसे अलग-अलग सी 
आँखे खोले जागे-जागे सोती हो। 
सम्भाल लेती हो आँसूं जाने कहाँ तुम?
जाने किसको मेरी माला दे देती हो?
सच कहा था इन सितारों ने, गलियारों ने
और सच ही कहा था तुमने भी मुझसे
'' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !'

:-ज़ोया

pc @Googleimages 

मंगलवार, सितंबर 24, 2019

तुम्हारे काँधे की तितली !


 

 गहरा सा जो वास्ता था कोई
सच था , या वो धोखा था कोई 
गहरी सी जिसकी गिरहैं हैं सारी
मीठी सी मिसरी हैं यादें सारी
खुद में समेट लिया है मैंने उनको 
कोकून सा बांध लिया है खुदको 
पकेगा इक दिन समय भी मेरा
बदल जाएगा ये रूप मेरा    
सतरंगी परों से मैं सज उठूँगी 
हर धागा काट मैं उड़ पड़ूँगी 
हर इक बंधन फिर खुल उठेगा  
गिरहों से छूट ये मन उड़ेगा 
और फिर यूँ जाये शायद 
आ बैठूं पहने रंग और महक मैं
बन के तुम्हारे काँधे की तितली 
उठा के हाथों में तुम फिर मुझिको 
दुआ में कुछ उस ''रब'' से  मांगो   
जलूं मैं फिर उस दुआ के नूर से यूँ 
की मिल जाए तुमको तुम्हारी मनचाही नेमत
पर मिले वो तुमको ... मेरी राख से ही !

:-ज़ोया



PC@ google 

मंगलवार, अगस्त 27, 2019

तू मुझे कैसे भूल जाता है !


तू मुझे कैसे भूल जाता है ,
भूलकर कैसे सकून पाता है !

याद आती नहीं तुझे मेरी 
फ़िक्र सताती नहीं तुझे मेरी 
हमने बातों में इक सदी गुज़ारी थी 
 वो सदी तू कैसे भूल जाता है !

तू मुझे  कैसे भूल जाता है !

नाम इतने दिए मुझे तूने  
नाम इतने दिए तुझे मैंने  
कभी कोई कहीं तो सुनता होगा 
सुन के कैसे तू सह पाता है !

तू मुझे  कैसे भूल जाता है !

सबसे प्यारा तू दोस्त था मेरा 
दर्द-आशना था, था राज़दाँ मेरा
शिक़वा कोई नहीं मुझे तुझसे 
पर बता रब्त कैसे वो टूट जाता है 

तू मुझे कैसे भूल जाता है !

ज़ोया 

शनिवार, जनवरी 30, 2016

सिर्फ इक शब्द.. !


कुछ हफ्ते पहले हफ़्तों लगा के लिखी थी 
वो नज़्म, देखा लड़खड़ा के चल रही थी 
उसीके आगे सुस्त चाल चल रही थी 
इक ग़ज़ल कुछ दिन पहले जो लिखी थी 
त्रिवेनियाँ भी चला रही हैं काम किसी तरह 
पर हालत इतनी खस्ता थी की क्या कहुँ  
सोच में डूबी रही हफ़्तों इन्हें हुआ क्या है 
जहाँ तहां गिरी पड़ी हैं ,लंगड़ा के चलती हैं 
कुछ तो हुआ है इन्हें, जाने पर हुआ क्या है 

पोटली निकाली पुरानी नज्मों ग़ज़लों की 
इक - इक पलट - पलट के देखी, पढी 
और बात समझ में आ गयी  
मुस्कुरा के रख दी पोटली वापिस मैंने 

वही लफ़्ज़, वही कलम, वही मैं 
सब कुछ वही तो था, ना था तो बस 

सिर्फ इक शब्द  
जो उन सब ग़ज़लों नज्मों में बसा था 
सिर्फ इक शब्द 
वो इक शब्द जो अब मेरी सोच में नहीं 
मेरी नज्मों में नहीं मेरी ग़ज़लों में नहीं  
मेरी कलम में नहीं, मेरी सयाही में नहीं  
शायद वो "अब" मेरी जिंदगी में नहीं  

वो इक शब्द जो मेरी कलम को अक्सर 
खून में दर्द की सियाही मिला-२ पिलाता   
और फिर दर्द ही दर्द हर हर्फ़ में उभर आता
बस ...सिर्फ इक उसी शब्द के न होने से 
कलम खून की कमी से लड़खड़ा रही है 

सिर्फ इक शब्द...................."तुम" !
 ज़ोया****

penned on "Mar 21 ,2010"
pic from Google

शुक्रवार, जून 26, 2015

कल रात बहुत ही तन्हा थी




कल रात बहुत ही तन्हा थी
कल रात बड़ी नाचारी थी 

कुछ कहना था उसको शायद 
या कुछ वो सुनना चाहे थी 
चाहती थी रोना जी भर के 
कल रात बड़ी ही भारी थी !

न खिड़की थी उस घर में 
ना बाहर कोई गलियारी थी 
अंदर डसती थी तन्हाई लेकिन 
बाहर हर आँख शिकारी वाली थी 

जागती नींद  में सोयी थी वो 
वो सोये- सोये भी जागी थी 
सज़ा  जगरतों की क्यों मुझको 
वो खुद ही खुद से सवाली थी 

ना चाँद सजा था थाली में 
ना तारे पके थे सालन में 
आँख तक वो भर ना सकी 
कल रात बहुत ही खाली थी 

कल रात बहुत ही तन्हा थी
कल रात बड़ी नाचारी थी 

                                                                                                                        :- ज़ोया****

रविवार, जनवरी 19, 2014

"अल्हड़ गुड़हल "



''अल्हड़  गुड़हल'' यही नाम रखा था तुमने इसका
 सही नामकरण हुआ था इसका , एकदम  सटीक 
मुझसे यही एक हाथ ही ऊँचा होगा शायद 
पर यूँ लदा रहता सुर्ख लाल फूलों से
ज्यूँ किसी अल्हड़ ने लाल फूलों के 
पांच दस गुच्छे सज़ा लिए हों अपने बालों में 
ज़रा सी हवा से गुच्छे आपस में टकरा जाते  
और यूँ बिख़र जाते यहाँ वहाँ
ज्यूँ गज़रे कि कलियाँ  बिखरें 
इसकी कमसिन अल्हड सी छाया में
जाने कितनी मुलाकातें सजती
कितनी ही बाते-हिकायतें जन्म लेती 
 गर कभी कोई फूल ज़ुल्फ से उलझ जाता  
तुम टेढ़ा सा मुहँ बना चिड़ के कहते,
 ''बस इसकी यही बात पसंद नही मुझे"
 ये तो बस मेरा हक़ है"!
और फिर फ़ैल जाती पाँचों ओर 
इसकी पंखुड़ियों सी  हमारी खिलखिलाहट !


पर सालों बाद,  देखा इसे तो स्तब्ध रह गयी 
उसपे कोई फूल नही था ..  पत्ते भी ना के बराबर 
साया तो ज्यूँ खुद उससे अपनी बाज़ुएँ छुडा रहा हो 
खूब सीँचा तुमने इसे शायद, मेरे जाने के बाद 
मगर खारे पानी से  .. अपने दामन की ही तरह


अछा सुनो! मेरा इक काम कर सको तो कर देना 
गुज़रों उधर से जो  फिर कभी गलती से तुम 
तो उस गुड़हल को कोई नया नाम दे देना 
अक्सर देखा है मैंने, नया नाम जुड़ने से 
नया रंग चढ़ जाता है, नया सफर शुरू हो जाता है !

वैसे भी ............... ये गुड़हल  अब  अल्हड़ नही रहा !

                                                                                                        ज़ोया**** 


-- 

बुधवार, जुलाई 31, 2013

लम्स की तपिश



बस इक बार ही चखा था मैंने 

तुम्हारा लम्स अपनी ठंडी रूह से लेकिन

बरसों सुलगता रहा रूह का वो हिस्सा

और चिंगारी की तरह रूह को पकाता रहा 

बस उस लम्स की तपिश से सिकती रही 

और जीती रही सालों - साल 

चखती रहती रूह उस चिंगारी को धीरे-धीरे

और पक के निखरने लगी, बढ़ने लगी 

ज्यूँ- ज्यूँ मेरी रूह का दायरा बढ़ता गया

चिंगारी चखने की आदत भी बढती गयी


पर वक़्त के साथ मधम हो चली है तपिश

दायरा बहुत फैलने लगा है रूह का

और साथ ही बढने लगी है इसकी ठंडक


……………. बस कभी आके,  इक बार फिर से

जरा सा चखा जाना रूह को अपना लम्स ……

.कुछ साल और...जी लेगी बेचारी

तुम्हारे इक लम्स की तपिश में!

                                                                                 ज़ोया ****

शुक्रवार, मई 10, 2013

सुबह से रात मेरी ही तरहां




सुबह-सुबह देखा चाँद की पलकें बोझिल सी थीं 
सपनों के डर से जागता रहा होगा, मेरी ही तरहां 

दोपहर भी ना जाने क्यूँ कुढ़-कुढ़ के जले जाती है 
कोई कसक उसे भी झुलसाती होगी, मेरी ही तरहां

शाम को लग गयी है किसी की काली नज़र शायद
ख़ामोश सी रहती है, तन्हा - तन्हा मेरी ही तरहां

रात मुहं छिपाए रो रहा था चाँद फफ्क-फफ्क कर
आसमां से जंग- ओ-जदल हुई होगी, मेरी ही तरहां

लैल ओ नहार की तजस्सुस भी जाने क्या है 'जोया'
बस बदलते ही रहते हैं सुबह से रात मेरी ही तरहां
  'जोया'










**************************
जंग- ओ-जदल - लड़ाई
लैल ओ नहार - रात और दिन
तजस्सुस - उत्सुकता , खोज

मंगलवार, अप्रैल 30, 2013

मुई अमावस ने टोका था !

उम्र गुज़र गयी इस चाँद पे

कलम टिका के लिखते लिखते

हुआ कलाम जो पूरा तो जाना

कुछ पन्ने थे उज्ज्ले उज्ज्ले
  
और कुछ पन्ने गहरे काले थे

मैंने तो नज़र टिका के बस हमेशा

चाँद देख देख ही लिखा था

पर भूल गयी थी ये मैं लेकिन

हर 15 दिन में मेरी कलम को

इस मुई अमावस ने टोका था !
जोया  

गुरुवार, अप्रैल 25, 2013

घुटन के गुब्बारे





कस  के हाथ कानों पे रखे थे मैंने 
फिर भी यूँ लग रहा था मानो 
शोर दिमाग की नसें चीर डालेगा 
घुटन के गुब्बारे उफन उफन के 
छत से टकराते और लौट आते 
सारा कमरा भर गया गुब्बारो से 
दबाव तेज़ी से बढ़ रहा था उनमे 
और बढ़ता जा रहा था उनका आकार भी
देखते ही देखते संख्या भी बढने लगी  
और बढ़ता जा रहा था उनके टकराने से 
उत्पन होता शोर भी !

और फिर एक धमाका - "बुम्म्ब " 
जहाँ तहां बिखर गये गुब्बारों के चीथड़े 
इक गर्म सा टुकड़ा  आँख पे  आ गिरा
आह ! और नींद से जाग उठी  

जाने मैं सपने में थी के 
सपने में वास्तविकता थी !

दबाव इतना बढ़ गया गुब्बारों में की सह नही पाए  

शुक्र है 
दिमाग पे भौतिक विज्ञान के नियम लागू नही होते !

 जोया

सोमवार, अप्रैल 09, 2012

मेरा वो इक ख़त




समेट के भेज रही हूँ  सुबह सुबह की बारिश 
मेरे इक ख़त में 
कुछ बूदें ...कुछ लड़ियाँ पानीयों से सनी
महकती मिटटी की खुशबू ....कुछ हवाओं का सीलापन
इक सार गिरती बूंदों  से बनी गले की माला 
और रिमझिम -2 करती कानों में अटकी बूंदों की बालियाँ .
जब खोलोगे मेरा ख़त तो बताना...,था क्या ये सब सामान
मेरे उस ख़त में 
सजल आकाश का धूआं ...भीगी धरती की कंपक्म्पाहट   
लोहे की तार पे हीरों सी चमकती  बूँदें 
खम्बे के सहारे टिकाया बदन ,और उस बदन की सिरहन 
फर्श पे ठहरा पानी .....और उसमे धुंधला सा मेरा अक्स 
जब पढोगे  तुम मेरा वो ख़त , तो बताना ,क्या मेरा अक्स था 
मेरे उस ख़त में  
जब बंद करोगे मेरा वो ख़त तो देखना ,
हथेली पे सिलापन था के नही....या थी कुछ बूंदें
सिरहन कौंधी थी तुम्हारे भी बदन में 
सजल हुआ तुम्हारा भी आकाश के नही 
क्या पहुंचा तुम्हारी भी आँखों में धुंआ के नही 
मेरे उस ख़त से 

और हाँ  !
सम्भाल पाओ तो ही रखना .वो सब सामान
"बारिश, सुबहा की नमी और मेरा वो ख़त "
 मगर मौड़  के मत रख देना किसी किताब में 
 खामखाँ !...किताब भीग जाएगी ......
मेरे उस ख़त से  !




                                                                        ज़ोया  

शुक्रवार, मार्च 23, 2012

ज़ोया का चाँद




इक शाम थी 
जिसे चाँद की तलाश थी 
पर चाँद था के 
रात के आँचल में छुपा हुआ 
मद्दतों तरस की उमस में 
शाम झुलसती रही 
मुद्दतों प्यास की नदी में 
शाम तैरती रही 

और फिर इक दिन 

इक सर्द सी दोपहर में 
चाँद रात के आँचल से निकल 
शाम की गोद में आ गया 

वो जो इक तरस थी
वो जो इक प्यास थी 
अपनी नन्ही सी आँखों के 
नर्म उजालों  से बुझा गया 
वो जो तजस्सुम थी ज़ोया की
अपनी आमद से मिटा गया  !
                                                                                                                                     
Dedicated to my jaan ...my lovable Son "Aadhvan"(Monu)
                                                                                                                                                
                                                                                     ज़ोया


गुरुवार, नवंबर 24, 2011

'जहाज़ की चिड़िया'




कुछ नही था वहां उसके लिए 
न प्यास बुझा सके इतना पानी
ना तन मन की भूख ही मिट सके 
ऐसा कुछ था उसके लिए वहां
ना हरियाली जिंदगी की 
ना खुशहाली रिश्तों की 
रह-२ के रेतीली हवाओं के थपेड़े 
उसके नाज़ुक से जिस्म को 
उधेड़ जाते खरोंच जाते 
तपते सूरज की कटीली आंच 
उसके परों को झुलसा जाती 
कई बार वो उड़ के दूर चली जाती
दूर दूर तक उड़ आती .....
दूर दूर तक फैले अथाह समंदर में 
और फिर थक के वापिस लोट आती 


इक दिन छूट गयी थी अपने ज़हाज़ से 
ये 'जहाज़ की चिड़िया' इस रेतीले टापू पे 
अब यही है  इसका ....घरौंदा या पिंजरा !
कई बार दूर दूर तक उड़ आती है ..
और फिर थक के वापिस लोट आती  !
जोया**** 


मंगलवार, जुलाई 26, 2011

फिर यूँ हुआ



फिर यूँ हुआ के चाँद धीरे धीरे ढल गया
ठीक उसी तरह जिस तरह ढलते हैं 
हर रात  आंसू आँख से होंठ तक
सुबह के लिए  खारापन  छोड़ कर

अगली रात सब चाँद को ढूंढते रहे
ना अमावास थी न चंद्रग्रहण 
ना बादल ही थे  आसमान में 
पर चाँद कहीं न दिखा..कहीं नही 

सुना है  उसके बाद फिर कभी 
आंसू भी नही ढले आँख से 
ना सुबह ने कभी खारापन ही चखा 
जाने क्या हुआ उस रात दोनों में !



जोया ***



शुक्रवार, जून 03, 2011

रात चाँद और मैं ...गुलज़ार साहब


आज गुलज़ार साहब की कलम से निकला इक नायब मोती ले के आई हूँ...उम्मीद हे आप सब को पसंद आयेगा ....




उस रात बहुत सन्नाटा था
उस रात बहुत खामोशी थी
साया था कोई ना सरगोशी
आहट थी ना जुम्बिश थी कोई
आँख देर तलक उस रात मगर
बस इक मकान की दूसरी मंजिल पर
इक रोशन खिड़की और इक चाँद फलक पर
इक दूजे को टिकटिकी बांधे तकते रहे

रात  चाँद  और  मैं  तीनो  ही  बंजारे  हैं
तेरी  नम  पलकों  में  शाम  किया  करते  हैं  
  

कुछ  ऐसी  एहतियात  से  निकला  है  चाँद  फिर
जैसे  अँधेरी  रात  में  खिड़की  पे  आओ   तुम  

क्या  चाँद  और  ज़मीन   में  भी  कोई  खिंचाव  है
 
  
सितारे  चाँद  की  कश्ती  में  रात  लाती  है
सहर   में  आने  से  पहले  बिक  भी  जाते  हैं

बहुत  ही  अच्छा  है  व्यापार  इन  दिनों  शब  का  




 बस  इक  पानी  की  आवाज़  लपलपाती   है
की  घाट छोड़  के  माझी   तमामा  जा   भी  चुके  हैं 

चलो  ना  चाँद  की  कश्ती  में  झील  पार  करें


रात  चाँद  और  मैं अक्सर  ठंडी  झीलों   को
 डूब  कर  ठंडे  पानी  में  पार  किया  करते  हैं
                                                                             -: गुलज़ार साहब 

मंगलवार, मई 17, 2011

राज़





शाम को ओढ़े वो रात तक बैठी रही 

ना कोई आवाज़ ना ही कोई ज़ुम्बिश

देखो तो लगे उस साये के साये में 

घने- गहरे राज़ चैन से सो रहें हों  

ग्हम्माज़ हवा ने कोशिश तो बहुत की 

जुल्फों को हटा कुछ असरार जानने की 

पर रात कुछ यूँ पसरी थी उसपे 

की बस इक अँधेरे के सिवा कुछ ना था 

कुछ देर उलझ के, हवा भी चली गयी 

हलकी सी ज़ुम्बिश हुई 

संगीन पलकें उठी ...चाँद की तरफ

और इक आंसू गालों से ढलता हुआ

ज़ुल्फ़ में जा दफ़न हों गया ,जिस तरह 

वो राज़ दफ़न हैं कहीं, जिसे हर रात 

ग्हम्माज़ हवा ढूंढने की कोशिश करती है 

रात में लिपटी वो युहीं रातभर बैठी रही 

सहर तक घूंट घूंट चांदनी पीती रही

ना कोई आवाज़ ना ही कोई ज़ुम्बिश

देखो तो लगे उस साये के साये में 

घने -गहरे राज़ चैन से सो रहें हों !
                                                     
                                                                                                                                             जोया****



****
ज़ुम्बिश - Movement
ग्हम्माज़ -informer
असरार-secrets
संगीन -heavy,made of stone

गुरुवार, अप्रैल 21, 2011

दोपहर से शाम हो आई




वो बड़ी देर तक उस तरफ निहारती रही 
वो थके बोझिल से क़दमों से
चले जा रहा था ...कभी रुकता मुड़ता
दो पल फिर ठहरता...जाने क्या सोचता
शायद ....वो उसे वापिस बुला लेगी
 कुछ देर ठहरने के बाद फिर चल पड़ता
फिर आगे बढ़ जाता फिर रुकता
फिर मुड़ता फिर सोचता और फिर चल पड़ता
और ये सिलसिला तब तक चला
जब तक के मोड़ ने करवट नही खायी
मुड़ने से पहले वो फिर रुका ,मुड़ा
पर इस बार दो पल के लिए नही
बड़ी देर तक ...और निहारने लगा उसे  
और वो
चेहरा भावशून्य...कठोरता से कसी आँखें   
खड़ी रही ..ज्यूँ जड़ हो   .पत्थर हो

लोगों और गाड़ियों से भरी सड़क के किनारे 
 इक  निर्वात बन गया  
 ज्यूँ समय कुछ पल को  जम गया हो 

और अचानक इक तेज़ आती गाडी के होर्न ने 
 दोनों की सान्द्रता तोड़ी 
दोनों ने इक नजर भरपूर  देखा इकदूजे को
वो आँखों से ज्यूँ सवाल कर  रहा हो
पर जमी खाली आँखों से निरुत्तर हो
वो ....वो मोड़ मुड गया !
 .
दोपहर से शाम हो आई
वो अभी भी वहीँ है
पर अब
चेहरा दोपहर से बिलकुल अलग है
 वेदना पसरी है और आँखों में सैलाब
ताश के पत्तों का मकान ज्यूँ गिरे
यूँ ढही बैठी है !
वो अभी भी उस तरफ निहारे जा रही है  !

.
                      जोया**** 


.**************
निर्वात--- Vacuum
सान्द्रता -- Concentration
वेदना --- pain