बुधवार, अगस्त 25, 2010

शफ़ीक़ लम्स -ए- तवील जी चाहता है


दुनिया भर से खुद को छुपाने को जी चाहता है
आ के तेरी पनाहों में खो जाने को जी चाहता है

थक चुकी हूं मैं लबों पे दिन रात चिपका के हंसी
आ के तेरी बाहों में छुप के रोने को जी चाहता है

ये जिंदगी लगने लगी है अब मुझे सितमज़रीफ़ सी
आ के तेरा शफ़ीक़ लम्स -ए- तवील जी चाहता है

सौदा ए इंतज़ार के जगरतों में कटी मेरी सारी रातें
आ के आगोश में जी भर के सोने को जी चाहता है

मेरी तो ये उम्र कट गयी बस इक तुझे याद करने में
आ के बता तुने भी याद किया,सुनने को जी चाहता है

तजस्सुम ओ कारगाहे हस्ती में इस कदर फंसी हो 'ज़ोया'
फिर भी यदा -कदा कुछ न कुछ लिखने को जी चाहता है
***





शफ़ीक़ - snehbhra
लम्स -ए- तवील - lmbaa sparsh
तजस्सुम - khoj..search
कारगाहे हस्ती - your workplace of life...or..jiwan ki karmbhoomi




3 टिप्‍पणियां:

Kaushalendra ने कहा…

Sirf itnaa hi khungaa-"jin khojaa tin paaiyaan gahre paani paithi".Joya!ji open d door n window,dont bother with d dust n unwanted things,b happy with d rays of d light.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

चांद की सहेली*** : * जोया *

बहुत ख़ूबसूरत ब्लॉग ! बहुत ख़ूबसूरत नाम !
रचना भी कम नहीं …

ये जिंदगी लगने लगी है अब मुझे सितमज़रीफ़ सी
आ के तेरा शफ़ीक़ लम्स -ए- तवील जी चाहता है



हां , छंद पर थोड़ी और मशक़्क़त कीजिए , बहुत अच्छा नतीज़ा सामने आने की तवक़्क़ो' है ।
…और इतने उस्तादाना अंदाज़ में उर्दू अल्फ़ाज़ के प्रयोग के बीच में यदा - कदा जचा नहीं ।

- राजेन्द्र स्वर्णकार

संजय भास्‍कर ने कहा…

मेरी तो ये उम्र कट गयी बस इक तुझे याद करने में आ के बता तुने भी याद किया,सुनने को जी चाहता है
तजस्सुम ओ कारगाहे हस्ती में इस कदर फंसी हो 'ज़ोया'फिर भी यदा -कदा कुछ न कुछ लिखने को जी चाहता है***

गजब कि पंक्तियाँ हैं ...

बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...