शुक्रवार, दिसंबर 17, 2010

मेरे आस्तित्व का अंश

“मेरे आस्तित्व का अंश””इस रचना को  पे एक बात शेयर करना चाहूंगी..एक समझदार दोस्त ""The Idiot"" -वैभव जी ने एक दिन,बड़ा अजीब सा ख्याल रखा .hum  सब आज  तक ..एक लड़की के होने उसकी व्यथा उसके दर्द  की बात करते हैं पर एक माँ.क्या सोचती होगी जो इक बच्चे को जनम देने जा  रही है और उसे पता चलता है की उसकी बेटी है ...और उसे इस अजन्मी बेटी से पीछा चुराने के लिए कहा जाता है ,फिर उसे किन परस्थितियों से गुजरना पड़ता है .
hmmmm........हाँ कुछ लम्बी है ...क्यूंकि ये ..4 भावों को दिखाती है
1)वो ख़ुशी जो बच्चे की खबर पे आती है
2) वो जब पता चलता है के बेटी है
3) जब माँ अपना दुःख देखती है
4 जब माँ ..औरत की गरिमा को मान देती है .....






"चाँद सा लला आवेगा झोली में
रानी बन जायेगी मेरी बहुरिया
बिटवा मेरा राजा बन जावेगा
मेरा मान तिगुना हो जावे
चाँद सा लला आवेगा "

 सास के ये नाचते उछलते शब्द
मेरी ख़ुशी को दुगना कर जाते
इनकी खुशी से तनी भवों में
मेरी आत्मतृप्ति को मायने मिल जाते
अपनी कोख में फूटे अंकुर की ख़ुशी
सम्भल नही रही मुझसे  
हर तरफ पूछ है  मेरी
 सास को वंश का वारिस मिलने वाला है
इन्हें कुल का दीपक मिलने वाला है
नये नये सपने ..नई नई उमीदें
उस जीव से अभी जो शायद
मुठी भर का हो पाया है

लेकिन आज वो उमीदें-सपने सारे ठन्डे है
ख़ुशी की तपिश आज बर्फ की सील सी है
अब सासू माँ मुझसे फिर नाराज़ है 
इनकी भी नज़रें कटीली सी है
कल तक राजरानी कहते थे
आज फिर से करमजली पुकारा है
वंश की निर्दयी दूरबीन ने देख ली  मेरी कोख
फिर से बिटिया पाल रही है बदनसीब 
हुकम हुआ है इससे पीछा छुड़वा लूँ
इक सड़े हिस्से की तरह निकल फैंक दूँ
 जैसे घर में अनचाहा जानवर घुस आये
वो खरपतवार जो उग आये खेत में
ज्यूँ ये मेरे जिस्म का हिस्सा नही
जिस्म में पलता  फोढा हो कोई
 सास की नाक नीची हो जावेगी
इनकी मूंछ निचे मुड़ जावेगी 

पर मैं कैसे उखाड़-खदेड़ दूँ इसको 
पिछले कितने दिनों से सींच रही हूँ 
कितने हफ्तों से साँसे बाँट रही हूं
 पहरों  बतियाये हूँ इससे
सब के लिए ये हांड मांस है
पर मेरे लिए
जिस्म की  माटी में अंकुरित बूटा 
हरे वृक्ष पे खिलता गुलाबी पुष्प
बिन देखे बिन छुए महसूस किया है मैंने
इसकी सहमी सहमी सी सांस सुनी है
इसकी खामोश आवाज़ से ”माँ ”सूना है
अपने गर्भ के तैरते देखा है इसको

सिर्फ बेटा हो तभी जीवन दूँ इसको
बिटिया है तो हाथों से मसल दूँ 
मैं हथ्यारण -पापन नही हो सकती
मेरे जिस्म का टुकडा है ये
तुम्हारे लिए सम्भव है शायद
इसकी चिता पे नया फूल खिला लेना
 मेरे जिस्म को कारखाना बना लेना
अपनी पसंद का खिलौना ले ले लेना
पर मेरे अंदर जीती है जूड़ी है ये

मेरे लिए ना बेटा है ना बेटी
मेरे लिए मेरे आस्तित्व का अंश है
बहु ,पत्नी भाभी , बिटिया बहन और माँ
सब रिश्ते जीती हूँ मैं खुद को बाँट के
पर इन सब से ऊपर”इक औरत हूँ मैं”
कई बार मैं चुप रही कई बार मैं सह गयी
तन मन धन स्वाभिमान खुशियाँ
सब कुछ वारा हारा है मैंने
पर मूक रही सब सह गयी
पर अब 
 अब मैं मूक ना रह पाउंगी
खुद के लिए फैसले ना ले सकी तो क्या
अपने आस्तित्व के अंश के लिए लुंगी
 आज …….बस .... इक औरत हूँ मैं
अपना मान और निचा ना करूंगी मैं
ये मेरा तन है ,ये मेरा मन है
अपने तन से अपना मन जुदा न करूंगी मैं
इसे खुद से अलग ना करूंगी मैं




मेरे आस्तित्व का अंश  


खुद से अलग ना करूंगी मैं




10 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Bahut Dino se Dekh rha rhun hun,Apko, aapka lekhan.Bahut Soz he aapki Kalam me.Aap aisa Likhti hain Jaise sab apni Aankhon se dekha ho Smjha Mehsus kiya ur jab Likhti hain to wo Hum pdne wale Mehsus krte hain.

Kaushalendra ने कहा…

अति संवेदनशील रचना ....देह की माटी से अंकुरित होता बूटा .........जोया ! आप शब्दों को जी रही हैं ...आपने पीढ़ियों से दबी-कुचली सिसकी को आवाज़ देने का सफल प्रयास किया है ....बस एक ही शिकायत है कि इतना माइक्रोस्कोपिक लिख दिया है कि मेरे जैसे डोकरों को पढ़ने में नानी-दादी सब याद आ जायेंगी ........मेहरबानी करके फॉण्ट थोड़ा तो बड़ा कर दीजिये...और भविष्य में भी हम जैसे बुड्ढों की आँखों का ख़याल रखना ......बहुत आशीर्वाद मिलेगा.

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

बहुक ही सार्थक प्रस्तुति. समाज को एक सच्चा आईना दिखाती हुई सकारात्मक सोच...

venus**** ने कहा…

hmmm
aap sab ka tah e dil se shurkiyaaa

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत ही मार्मिक और संवेदनशील प्रस्तुति..पता नहीं लड़कियों के बारे में हमारे समाज का नजरिया कब बदलेगा.कितने बदनसीब हैं वे लोग जो बेटी की आने से पहले ही हत्या कर देते हैं, और महरूम रह जाते हैं सच्चे और निस्वार्थ प्यार से जो केवल बेटी ही देसकती है. दिल को छू लिया आपकी प्रस्तुति ने..शुभकामनाएं

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत ही मार्मिक और संवेदनशील प्रस्तुति..पता नहीं लड़कियों के बारे में हमारे समाज का नजरिया कब बदलेगा.कितने बदनसीब हैं वे लोग जो बेटी की आने से पहले ही हत्या कर देते हैं, और महरूम रह जाते हैं सच्चे और निस्वार्थ प्यार से जो केवल बेटी ही देसकती है. दिल को छू लिया आपकी प्रस्तुति ने..शुभकामनाएं

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत मार्मिक रचना ..आज की ज्वलंत समस्या पर अच्छी प्रस्तुति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

रचना में आप बहुत कुछ कह गईं!
नारी मन को बहुत सुन्दर तरीके से प्रस्तुत किया है आपने!

unkavi ने कहा…

samvedanaa ko salaam.

संजय भास्कर ने कहा…

संवेदनशील रचना .