शनिवार, सितंबर 17, 2011

कारगाहे हस्ती में यूँ फंसी है 'ज़ोया'



तौक़ीर ओ ऐतबार ओ इस्मत हो या हो 'माँ का प्यार'
ये वो दौलत है , जो फिर ना मिले उम्र भर कमाने से

ए दिल चल के ढूंढें नया और कोई ज़ख़्म  ज़माने में 
उकताहट सी हो गयी है मुझे अब  इक ही फ़साने से


अब तो वो याद भी नही के जलाए दिल ओ जाँ मेरी  
फितरती दर्द ही रह-रह के आना चाहता है बहाने से

सुना है कुछ ख़ास तू भी नही नाम - ए - आमाल में 
होता गर , तुझे फुर्सत मिलती कभी मुझे सताने से

तजस्सुम-ओ -कारगाहे हस्ती में यूँ फंसी है 'ज़ोया'
कई दिनों से वक़्त ही नही शिकायत का ज़माने से !
 जोया ***





तौक़ीर ओ ऐतबार - Honor ,Respect and Trust
 नाम - ए - आमाल - Record of Work,Conduct
तजस्सुम -Research ,Search
कारगाहे हस्ती -workplace of Life 

15 टिप्‍पणियां:

इमरान अंसारी ने कहा…

सुभानाल्लाह.......ये अद्पकी नहीं पूरी पकी ग़ज़ल अहि और इस शेर ने तो दिल जीत लिया -

अब तो वो याद भी नही के जलाए दिल ओ जाँ मेरी
फितरती दर्द ही रह-रह के आना चाहता है बहाने से

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत गज़ल ...

काम से थोड़ा वक्त निकाल यहाँ भी दीदार करा दिया कीजिये ..बहुत दिनों में आना हुआ आज ..

वन्दना ने कहा…

ए दिल चल के ढूंढें नया और कोई ज़ख़्म ज़माने में
उकताहट सी हो गयी है मुझे अब इक ही फ़साने से

बहुत सुन्दर गज़ल्।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

Kailash C Sharma ने कहा…

तजस्सुम-ओ -कारगाहे हस्ती में यूँ फंसी है 'ज़ोया'
कई दिनों से वक़्त ही नही शिकायत का ज़माने से !

....बहुत सुन्दर और भावमयी अभिव्यक्ति..

रविकर ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||

आपको हमारी ओर से

सादर बधाई ||

कौशलेन्द्र ने कहा…

जोया ! ज़िंदगी ख़ूबसूरत है......इसके उतार-चढ़ाव एकरसता को भंग करते हैं .....उकताना तो तब होता है जब एकरसता बनी रहे . बहुत दिन बाद आयी हो...पर एक अच्छी रचना के साथ. आती रहो.......

कौशलेन्द्र ने कहा…

गधे की क्लास शुरू हो गयी हैं. दोपहर भोजन के समय एक बजे उससे बात कर सकती हो - +918765634518

Rajesh Kumari ने कहा…

ए दिल चल के ढूंढें नया और कोई ज़ख़्म ज़माने में
उकताहट सी हो गयी है मुझे अब इक ही फ़साने से
kya khoob likha hai pahli baar aapko padh rahi hoon.i m impressed n following this lovely blog.god bless you.

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

तौक़ीर ओ ऐतबार ओ इस्मत हो या हो 'माँ का प्यार'
ये वो दौलत है , जो फिर ना मिले उम्र भर कमाने से
....बढ़िया शेर।

संजय भास्कर ने कहा…

किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

तजस्सुम-ओ -कारगाहे हस्ती में यूँ फंसी है 'ज़ोया'
कई दिनों से वक़्त ही नही शिकायत का ज़माने से !

बहुत उम्दा ख़याल....
सादर...

sushma 'आहुति' ने कहा…

खुबसूरत ग़ज़ल....

रचना दीक्षित ने कहा…

तजस्सुम-ओ -कारगाहे हस्ती में यूँ फंसी है 'ज़ोया'
कई दिनों से वक़्त ही नही शिकायत का ज़माने से !

क्या बात है. बहुत सुंदर नज़्म.

बधाई.

abhi ने कहा…

कितने सुन्दर शब्दों का इस्तेमाल किया है :)
बहुत ही खूबसूरत गज़ल बन गयी है :)