गुरुवार, दिसंबर 06, 2012

किरचें





कांच की झीनी सी तार से जुड़ा था रिश्ता

ना आंच सह सका , ना ही ज़रा सा दबाव 


अब रह - रह के किरचें चुभती हैं जेहन में !


                                                                                                जोया ****

7 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूब

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर...

venus****"ज़ोया" ने कहा…

sangeetaa ji and Kailash ji .........bahut bahut dhanywaad

sushma 'आहुति' ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति..

Vinay Prajapati ने कहा…

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ... आशा है नया वर्ष न्याय वर्ष नव युग के रूप में जाना जायेगा।

ब्लॉग: गुलाबी कोंपलें - जाते रहना...

बेनामी ने कहा…

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Anupama Tripathi ने कहा…

ओह ....बहुत बढ़िया ...