मंगलवार, अक्टूबर 15, 2019

'' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !''


धुल जम चुकी है चाँद पे क्या ?
या सिलबट्टे पे खुद को घिसता रहता है?
ना जाने ये चाँद क्यूँ रातों में अक्सर 
कतरा-कतरा मुझपे गिरता रहता है? 
मुंह बिचकाये रहता है, और
कहता है-'तुमने मुझको छोड़ दिया
उतर आई हो खुद ज़मीन पे, और
 मुझको ऊपर तन्हा छोड़ दिया
सालों का था याराना अपना
तुमने चंद रस्मों में तोड़ दिया।

कहा था मुझसे इन सितारों ने 
समझाया था रात के गलियारों ने 
    '' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !''
इक बार तुमने भी तो
 आंसूं पिरोते कहा था ना मुझसे
 '' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !''
वक़्त पड़े, तुम्हारे हो गए  
वक़्त पलटे तो पलट गए  
ठीक ही कहा था तुमने मुझसे 
 '' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !''

इक वक़्त वो भी था जब तुम, 
अक्सर मेरी गोद में सोतीं थीं 
पहरों बातें करती थीं मुझसे 
आँख मिचौली खेला करतीं थीं
आंसू पिरो के देती थीं तुम मुझको
मैं माला पहन कितना इतराता था
तुम नज़्मे-नगमे लिखती रातों को
और मैं पौ फटे तक सुनता था।

और आज ये दिन है देखो तो 
तुम वहां ज़मीन पे सोती हो, 
ना बातें करती हो मुझसे 
ना आँख मिचौली खेला करती हो। 
रहती हो मुझसे अलग-अलग सी 
आँखे खोले जागे-जागे सोती हो। 
सम्भाल लेती हो आँसूं जाने कहाँ तुम?
जाने किसको मेरी माला दे देती हो?
सच कहा था इन सितारों ने, गलियारों ने
और सच ही कहा था तुमने भी मुझसे
'' ये इंसान कुछ ऐसे ही होते हैं !'

:-ज़ोया

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शुक्रवार, सितंबर 27, 2019

बुझती आकांक्षा


 गाड़ी के रुकने की आवाज़ आते ही घड़ी की तरफ ध्यान गया, हम्म्म .....आठ बज गए। आकांक्षा ने शीशे के बड़े से  दरवाज़े  से बाहर देखा, राज गाड़ी से निकल के गेट खोल के अंदर आ रहा था। अभी दरवाज़े तक पहुँचता की फोन जेब से निकाल लिया। आकांक्षा ने इक मुस्कान के साथ दरवाज़ा खोला। उधर से इक अजीब सा रिऐक्शन आया, जो कई सालों से मिल रहा है, पर क्या बोलते हैं इसे, वो उसे पता नहीं। इक रिऐक्शन, जो बस करने के लिए कर दिया जाता है, फीकी सी, अधपकी सी मुस्कान। इस रिएक्शन का क्या नाम होता होगा। वो अपने ही ख्यालों में दरवाजे पर खड़ी रह गयी और राज कब सोफे पे आ बैठ गया उसे  एहसास भी नहीं हुआ। 
पानी का गिलास रखते हुए, मुस्कुराते हुए आकांक्षा ने पूछा,  "दिन कैसा रहा आज, अच्छा रहा सब .. मीटिंग .?

हमेशा की तरह, मोबाइल की तरफ देखते हुए जवाब आया, "गुड"। 

चाय की प्याली मेज़ पर रखते इक नज़र राज की ओर देखा। ध्यान अभी भी मोबाइल में था। ना चाहते हुए भी कहा, "चाय त्यार है, साथ में सनैक्स भी हैं"। 

"हूँ"। 

उठ के रसोई की तरफ़ जाते-जाते, इक पल पीछे मुड़ राज की तरफ देखा और फिर उसकी सोच ने उसे अपनी आगोश में फिर भर लिया। 

ऐसा लगता है रोबोटिक टाइम लूप में हूँ मैं, समय आगे तो बढ़ता है मगर समय फिक्स्ड पैटर्नस में रहता है। मशीनी सी ज़िंदगी, भाववाहिन, रागवाहिन। सालों से यही पैटर्न है.. सेम। 
शुरआती वक़्त में, झूठी-मुठी रूठते हुई फोन खेंच कैसे गोद में बेठ जाती थी, "फोन  छोड़ो, मुझे देखो! समझे" और खुद ही खिलखिला उठती। और राज का वही रिएक्टशन, जिसका उसे आज भी नाम पता नहीं। पर वो  मनोहार करती रहती। 
दिन में कितने ही मौके, हफ्ते में कितनी ही बार, महीनों में कितनी दफा, सालों में कितने अवसरों पर , छोटी छोटी बातों पर...,बड़ी-बड़ी बातों पर, आकांक्षा अपनी सुंदरता, अपनी सुघड़ता, अपनी सादगी, अपनी जीवंतता से हर नीरस भाव में रस भरने की कोशिश में लगी रही।  कितनी दफा बैठ के दिल की बात कही, समझायी।
जो कहना चाहती थी, जो सुनना चाहती थी.............सब।
हर आस, हर चाह, हर उमंग हर कोशिश..............सब।
फिर धीरे धीरे, सब बेअसर, बेवजह ......................सब। 
फिर धीरे धीरे, सब उबाऊ होने लगा......................सब। 
यहां तक की कोशिश करने की सब चाह भी...........सब।

अचानक से बेटे ने आके जब कस के जपफी डाली तो आकांक्षा अपने ख्यालों के जाल से बाहर आयी।  
''मम्मा , स्टोरी टाइम''।  

इक जीवंत मुस्कान ने  हाँ में जवाब दिया। "ओके, पापा को खाना दे के आती हूँ ....... आप जल्दी से ब्रश करो, नाईट ड्रेस चेंज करो, मम्मा अभी आयी। ओके ।  

हिरण की तरह उछलता हुआ भाग गया।  वो जीवंत  मुस्कान  होंठों पर चिपकी रह गयी।  

 "आ जाओ ,खाना परोस दिया हैं, सूजी की खीर भी बनाई है।"

"हाँ, आता हूँ थोड़ी देर में''। 

वो वहीँ  खड़ी राज की और देख रही थी। 

मगर अचानक, उसके शरीर में से वो  निकल के बाहर आ गयी।  हु-ब -हु आकांक्षा की तरह, मगर थोड़ी यंग, थोड़ी  उमंग से भरी, ताज़ा तरीन सी और चहचहाते हुए बोली,   'थोड़ी देर में नहीं, अभी के अभी, देखो तो कितना टेस्टी खाना बनाया है, दाल भी बनाई है, सब्जी भी बनाई, सलाद, और सूजी की खीर भी, गर्मागर्म, जल्दी से आओ ना , मुझे बहुत भूख लगी है कब से वेट कर रही हूँ आपकी और ये कहते-कहते बाँहें  राज के गले में डाल दी। 

मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं। सालों की उदासीनता और विराग ने आकांक्षा को नुकूलित कर दिया था इस परिस्थिति के साथ। 

वो जाने के लिए जैसे ही मुड़ी, किसी ने उसका हाथ यूँ खेंचा जैसे रोकना चाहता हो। उसके चेहरे पर इक हल्की सी, मगर दर्द भरी मुस्कान घिर आयी। वो जानती थी कौन रोक रहा है उसे।

राज..........., नहीं, बिलकुल भी नहीं, ये क्षण तो उसके जीवन में कभी आया ही नहीं।  

उसका मुड़ने का बिलकुल मन नहीं था, पर आस  का टूटना कितना दुःख देता है, वो अच्छे से जानती थी वो बेमन से मुड़ी। उस पतली सी हथेली को वो सालों से जानती है और उन छोटी छोटी पनीली आँखों को भी।  पिछले कुछ सालों से अक्सर वो उसका हाथ पकड़ के रोकती जो है। आकांक्षा ने स्नेहिल सी मुस्कान के साथ उसकी और देखा। 
उमंग और आस से भरी आँखों में आग्रह भर के वो कह उठी, "इक बार और कोशिश करते हैं ना, अभी लाख दो लाख बार ही तो कोशिश की है। 
आकांक्षा  ने बड़े प्यार से उसके गालों को छुआ, जैसे कोई छोटी सी अबोध सी बच्ची हो और फिर सिर हिला के उससे हाथ छुड़ा लिया। वो त्योरियां चढ़ा उसे नाराज़गी में घूरने लगी। 

 इक बार राज की तरफ देखते हुए 
आकांक्षा ने कहा, "ओके! बेटू को सुलाने जा रही हूँ" 

"हाँ, ठीक है गुड़ नाइट।"


इससे ज़्यादा के शब्दों की उम्मीद उसे बहुत साल पहले ख़त्म हो चुकी थी 

आकांक्षा  बैडरूम की तरफ मुड़ गयी।  रूम में ऐंटर करने से पहले उसने इक बार फिर अपनी रूखी, उदासीनता और निराशा से भरी, सुखी आँखों से पीछे मुड़ के देखा। वो अभी भी उसकी तरफ देख रही थी आँखों में पानी भरे।  




ज़ोया****



मंगलवार, सितंबर 24, 2019

तुम्हारे काँधे की तितली !


 

 गहरा सा जो वास्ता था कोई
सच था , या वो धोखा था कोई 
गहरी सी जिसकी गिरहैं हैं सारी
मीठी सी मिसरी हैं यादें सारी
खुद में समेट लिया है मैंने उनको 
कोकून सा बांध लिया है खुदको 
पकेगा इक दिन समय भी मेरा
बदल जाएगा ये रूप मेरा    
सतरंगी परों से मैं सज उठूँगी 
हर धागा काट मैं उड़ पड़ूँगी 
हर इक बंधन फिर खुल उठेगा  
गिरहों से छूट ये मन उड़ेगा 
और फिर यूँ जाये शायद 
आ बैठूं पहने रंग और महक मैं
बन के तुम्हारे काँधे की तितली 
उठा के हाथों में तुम फिर मुझिको 
दुआ में कुछ उस ''रब'' से  मांगो   
जलूं मैं फिर उस दुआ के नूर से यूँ 
की मिल जाए तुमको तुम्हारी मनचाही नेमत
पर मिले वो तुमको ... मेरी राख से ही !

:-ज़ोया



PC@ google 

मंगलवार, सितंबर 17, 2019

खुश ना रह पाओ तो यूँ करना....


                                                                                                                                       #ज़ोया

मंगलवार, सितंबर 10, 2019

ग़ुमशुदा बातें






इंसान खो जाते हैं दुनिया में अक्सर 
मैंने बातों को खो जाते हुए देखा है !

 रपट में नैन नक्श बताएं भी तो क्या? 

                   ज़ोया****

रविवार, सितंबर 08, 2019

शून्य से गुणा हो जैसे!



पूरा दिन गणित के सवाल जैसे 
अंत में सब शून्य से गुणा हो जैसे

मेहनत के सिक्के कमाए बहुत 
किस्मत फटी इक जेब हो जैसे 

इतना धूसर सर्द सन्नाटा दिलों में
 मरी चाहों का शमशान हो जैसे

  'ज़ोया' अब हर दिन ऐसे जाता  है 
  क़र्ज़ बकाया,कटती किश्त हो जैसे  




:-ज़ोया**** 


शनिवार, अगस्त 31, 2019

ठंडी चाय !


अभी ताले में चाबी डाली ही थी, की मोबाइल बजने लगा  उफ़्फ़ ! कौन होगा इस वक़्त। पहले सोचा के देखूं, पर थकान इतनी थी की सोचा आराम से अंदर बैठ के देखती हूँ उपर से ये मोबाइल भी ना जाने कहाँ हैं, एक तो बैग में इतना समान पड़ा रहता है कि कुछ समान ढूढ़ने के लिए अच्छी-ख़ासी मशक्कत करनी पड़ती है। 

ओ हो ।  अम्मा का फोन। कितनी बार कहा है शाम को 8 ..साढे 8 बजे के बाद ही फ़ोन किया करो, पर नही, बात तो सुननी ही नहीं है , हम्म्म्म, पर बेचारी परेशान होंगी।  नंबर डाईल करने लगी और फिर काट दिया। जानती हूँ क्या ज़रुरी बात होगी अम्मा की। पहले आराम से फ्रेश हो लूँ ज़रा, चैन से बैठ के फिर बात करती हूँ 

सच ..क्या जादू है पानी में, इसकी शीतलता से पुरे दिन की थकान बह जाती है धड़ाम से सोफे पे गिरी, दिन भर के बाद जी करता है कि बस यही सो जाऊँअपने हाथ की बनी इक कप चाय मिल जाए बस अभी! चाय बनाने के लिए उठने लगी ही थी के ख्याल आया।  उफ़्फ़,  अम्मा को फोन भी तो करना है। 

 दूसरी तरफ से वही कांपती हुई आवाज़ आई, "हेल्ल्ल्लो"
अम्मा कैसे बोलती है हेल्लो ..........उम्र अब आवाज़ में झलकने लगी है 

''हाँ अम्मा, मैं बोल रही हूँ..... फ़ोन किया था ..

"अरी लाडो, पहले नहीं उठाया फोन, कहाँ थी, कब पहुँची ऊनिर्सिटी से, सब ठीक है ना, तबियत कैसे है, खाना खाती है समे पर, सेहत का ध्यान रखा कर, खा पी लिया कर कुछ, पूरा दिन भागती-दौड़ती रहती है, फ़िक्र लगी रहती है तेरी

"जवाब भी दूँ के सवाल ही करोगी और ऊनिर्सिटी, इतने साल हो गए, अभी भी ऊनिर्सिटी, बोलो यूनिवर्सिटी।  

और फिर दोनों ज़ोर से हँसीं। कितना खनखनाके हँसती है अम्मा और मैं अम्मा के साथ। 

"सब ठीक ठाक है अम्मा .....खूब खा पी रही हूँ...खूब मोटी ताज़ी हूँ। तुम बताओ क्या हाल चाल हैं। मुझे समझाती रहती हो, अपना ख्याल तो रखा नहीं जाता, कब से कह रही हूँ यहाँ आ जाओ मेरे पास। पर नहीं हर बार वापिस भेज देती हो मुझे। उस ज़मीन पे बैठी रहो, ना जाने कब समझ आएगी मेरी बात, जहाँ जिंदगी हो वहाँ रहो। ज़मीन के टुकड़ों के पीछे जिंदगी जमाये बैठी हो ""

बीच में ही अम्मा बोल उठी, "अच्छा, ये बता कैसी है?


"ठीक हूँ अम्मा। .. सब ठीक है, काम अच्छा चल रहा" अपना बताओ कैसी हो?
बिटिया इक बात कहने के लिए फ़ोन किया था...और फिर चुप हो गयी....चुप्पी तोड़ते हुए बोली, 

""अच्छा ! मेरी अच्छी बेटी बनके बात सुन ले। वो, ह्म्म्म ...नीलेश का फोन आया था। पहले तो उसकी माँ से ही बात हुई। बहुत भली हैं। फिर उसने भी बात की, बड़ा अच्छा लडका है, लोग भी बहुत भले हैं, कितना मान देते हैं तुझे। और वो नीलेश .....वो तो कब से कह रहा है। मैं तुझे समझा समझा के थक गयी हूँ। मैं कब तक रहने वाली हूँ तेरे साथ। मेरे बाद तुने वैसी ही किसी की नहीं सुननी। उम्र बहुत लम्बी होती है लाडो ..........."

अक्सर सोचती हूँ की अम्मा मेरी लिए परेशान होती है या अपनी परेशानी से दुखी। अपने एकाकी जीवन का भार उनकी आँखोंसे..आवाज़ से साफ़ झलकता था। उसी भार के तले मेरे दबने का डर सताता होगा शायद

अम्मा की आवाज़ ने मुझे मेरी सोच से बाहर निकाला। 

"अभी परसों रम्मी आई थी, तीसरा बच्चा हुआ है उसे, देख तुझसे 7 साल छोटी है। जितनी जल्दी जिन्दगी बसे उतना अच्छा

""ये क्या लॉजिक हुआ भला ..अगर उसके 3  बच्चे हैं तो मैं क्या करूं.....अब 18 साल में उसने शादी कर ली .... तो मेरी क्या गलती है?.....हद है .....इसी रफ़्तार में लगी रही ... तो मेरी उम्र तक 10 बच्चे भी हो जायेंगे

और फिर जो मैं और अम्मा हँसी के आँखों में पानी ही आ गया।

पर अगले ही पल, इक सर्द आह महसूस की मैंने अम्मा की आवाज़ में....जैसी इक बर्फ की तह सी जम गयी हो उनके गले में।

""कब तक यूँ हँसती रहेगी ...जानती हूँ तू बात को समझती है। पर मैं अपना क्या करूं, जी नही मानता, मरने से पहले तुझे जोड़े में देख लूँ तो स्वर्ग मिल जायेगा। वरना शान्ति ना मिलेगी मुझे 

आखिरी शब्द साफ़ से सुनाई भी नहीं दिए ज्यूँ गला पकड़ लिया हो किसी ने..

"हाँ हाँ ..रो पड़ो.....बस अम्मा ऎसी बातें कर के मुझे इमोशनल कर लो, बस यही आखिरी हथियार है तुम्हारे पास मेरे लिए। ठीक है, ठीक है...जैसा तुम बोलो, वही करुँगी, ठीक है"।

"मैं तेरी ये बात ना जाने कब से सुन रही  हूँ। मैं तेरी ख़ुशी ही तो चाहती हूँ...नीलेश के बारे में सोच ले......बेटा... कितना मान देता है। तेरी खुशी में ही मेरे जान प्राण बसे हैं। बस, तुझे जोड़े में देख लूँ, फिर मैं भी विदा लूँ 

"बस करो अब ये....कहा ना ..जो बोलोगी वही....अब ये इमोशनल अत्याचार बंद करो ...और सुनाओ, रम्मी का तीसरा बच्चा कैसा है.""

और फिर इक ज़ोरदार ठहाका

"बस .मुझे ही सताया कर 

" तो और क्या करूँ अम्मा "

सुन ...जो चला गया उसे जाने दे। ..वि...

जुबान पर आते-आते नाम अटक गया हो जैसे। फिर वो चुप हो गयीं। इतने सालों हुए, पर अभी भी वो नाम इतना भारी है, जुबां उठाती ही नहीं। पर इतने सालों ने मुझे अब खुद को संभालना और समेटना सीखा दिया है। आगे कुछ मुझसे भी नहीं कहा गया। अम्मा भी समझ गयी। अब तक मेरी हर बात बिना कहे जो समझी है।

"लाडो, जो सही हो, वो हमेशा अच्छा होता है। ज़रूरतों और समे के साथ जिंदगी के फैसले लेने चाहिए फ़ैसलों पर ही आगे की जिंदगी निर्भर करती है

अम्मा से बात करते-करते कब डेढ़ घँटे बीते, पता ही नहीं चला। घड़ी देखी 10:30 हो रहे थे.......हद है! बस, अम्मा जब फोन करती है, वक़्त ऐसे ही भागता है। चाय तक नहीं पी। चाय की तलब अब सर चढ़ने लगी थी। अदरक और चायपत्ति डाल, पानी गैस पे चढाया और सोच खुद ब खुद सर चढ़ गयी। 

नीलेश, ह्म्म्म्म्म ! इसे भी 2 -3 महीने बाद ना जाने क्या दौरा पड़ जाता है। सीधा अम्मा को उठा के फोन, ह्म्म्म्म्म! पर अम्मा से उसका जुड़ाव महसूस किया है मैंने। 

ओ हो !! चाय का पानी उबल उबल के इक तिहाई रह गया । चाय का ये गहरा भूरा मैरूनिश सा रंग कितना प्यारा लगता है। और ये खुशबू..उफ़्फ़ ............  इक बिन बुलाई मुस्कान जाने खुद होंठों पर आ बैठी। 

                                                                    तुम्हे भी तो कितना पसंद था ना ये रंग। भूरा मैरूनिश सा रंग। और चाय की मदहोश कर देने वाली  खुशबू.... हम्म्म। अक्सर चाय बनाते वक़्त चाय के बदलते रंगों को देखना कितना पसंद था हमें। चाय के पानी में जब, सफ़ेद दूध डलता तो वो रंगों का घुलना, फिर वो बादामी सा रंग बनते देखना। कैसे निहारा करते थे। तुमने इन्ही रंगो को देख के मुझे वो सूट दिया था और कहा था, "ये हमारा चाय वाला सूट है"  कितना हँसे थे उसके नामकरण पर। अच्छे से उबले चायपानी के भूरे मैरूनिश रंग के साथ उस सफ़ेद दुपट्टे के कॉम्बिनेशन पर मर मिटी थी मैं

" क्या choice है " जैसे ही मैंने कहा, फटाक से बोले , "हाँ , वो तो है ही ...खुद को नही देखा कभीमैंने भँवें सिकोड़ीं भर तो बोले, ' अब मधुमक्खी  की तरहा मेरे पीछे मत पड़ जाना। तारीफ तो हज़म ही नहीं होती तुम्हे। अब घूरना बंद कर के, जल्दी से पहन के दिखाओ, देखूँ कैसा लगता है''  

अभी आईने में वो सूट पहने खुद को देख ही रही थी कि तुमने इक गहरी सी साँस छोड़ते हुए कहा, "हाय ! मुझे चाय बहुत पसंद है"  और हल्के से आँख मार दी। मुझे शर्माते देख बोले, "अरे ,चाय का तो बादामी रंग होता है तुम्हारा रंग तो रुह- ह्फ्ज़ा सा हो रहा है"। तुम्हे यूँ बच्चों सा खिलखिलाते हँसते देख, मैं भूल ही गयी की मुझे इस बात पर चिढ़ना है।  

अरे अरे अरे... सारी चाय उबल गयी....बस जरा सा सोच में क्या डूब जाऊं, वर्तमान ऐसे लगता है, मानो ठहर गया हो, पर असल में वो भविष्य की तरफ भाग रहा होता है। ना जाने अतीत के पलों में हँसते-हँसते कहाँ से इक आंसू फिर छलक के बाहर आ गया। मुझे अक्सर लगता है की वो आँसू मुझसे कह रहा हो, "इतने ज़ोर से ना हँसा करो.....दवाब से मैं बाहर आ गिरता हूँ। । फिर से चाय बनायी,  मग में डाल खिड़की पे आ बैठी। घूँट -घूँट के साथ सोच ना जाने कितने रंग बदलने लगी।

'टिंग-टिंग' मैसेज की ट्यून ने सोच तोड़ी 
Hey ..whats happening .... अभी बात कर सकती हो ?... .....

नीलेश  ..ह्म्म्मम्म 

"Hi ...कैसी हो"  नीलेश  की वही सौम्य, अफेक्शन से भरी आवाज़"मैंने अम्मा से बात की थी आज, सोचा तुम्हे बता दूँ......आज बहुत लेट आयी घर लगता है। कैसे रहा दिन .. .... ........ ........ ........ ............ ......

नीलेश अच्छा दोस्त ही नहीं इक अच्छा इंसान भी है। कितनी मर्तबा इतनी देर रात बात की मगर कभी मर्यादा की सीमा परे कुछ नहीं कहा। जाने क्यों सहन करता है मुझे...मेरी बेरुखी को..इतने वक़्त से और वो भी बिन जताये।  हम्म........सब कुछ जानने के बावज़ूद भी।

ओ हेल्लो। ..सो गयीं क्या। ..कहाँ ग़ुम  हो मैडम? आदतन खिड़की पर बैठी होंगी चाय का मग ले कर ..  गिर मत जाइयो निचे . .बहुत उधार बकाया है अभी।  

उफ़्फ़्फ़! वो बोल रहा हैं और मैं अपनी ही सोच की लहरों में गोते लगा रही हूँ। मुझे स्माइल करवाने में उसे महारत हासिल हो चुकी है अब तक और मुझे हँसाना जैसे डेली टारगेट हो उसका। 


मेरी हल्की सी हंसी सुन के वो कुछ खामोश सा हुआ और इक सांस भर के बोला  .. 

"चलो, बहुत थकी सी लग रही हो। ... .सोओ तुम अभी, कल मिलते हैं O.K" !


फ़ोन रखते ही, अम्मा की  उस आह की ठंडक मुझे अपनी साँसों में महसूस हुई बेख्याली में मग साइड पे रख के उठ खडी हुई। अलमारी से वही सूट निकाला। जाने कब से पहना ही नहीं। दुधिया सफ़ेद दुपट्टा उस गहरे भूरे मैरूनिश रंग से मिल कर भी बादामी रंग नहीं बना पा रहा था। 
शायद चाय की तरह ताप से अच्छे से घुल मिल के पकता, तभी मनचाही रंगत आती। कब से ये सूट यूँहीं पड़ा है। इक लड़की देखी थी इक दिन सड़क पर, बड़ी मुश्किल से अपना तन ढक पा रही थी। उसे दे आऊँगी, किसी के काम तो आयेगा ये।

घड़ी पे नज़र डाली ...हद है...12  बजने वाले हो गए। ना कुछ खाया, न कुछ पीया, ना कुछ काम-धाम। कल जाते ही गाइड पूछेगी रिपोट्स पर काम किया ..फिर फलाना धिम्काना। अम्मा की बच्ची ! जिस दिन बात छेड़ देती है, उस दिन यही होता है।

उफ़्फ़्फ़ ....अरे ! चाय फिर से ठंडी हो गयी।

ठंडी चाय का रंग बिलकुल दिलकश नहीं लगता और बासी सी स्मेल। गर्म करने पे सेहत के लिए ठीक नहीं रहती, स्वाद भी कुछ कसेला हो जाता है ......जैसे रुके हुए रिश्ते। 

ठंडी चाय फेंक के ... ढूध गर्म होने रखा। अम्मा भी अक्सर यही कहती है ..''ये सेहत के लिए अच्छा है। रंगों से ही जिंदगी नहीं चलती''  


ठंडी चाय धीरे धीरे सिंक से बह के उतर गयी....बस उसका हल्का-हल्का सा निशाँ बाकी है।

ज़ोया
 Oct 7, 2008

#ज़ोया

गुरुवार, अगस्त 29, 2019

पिछले साल का कलैंडर


वो 
दिन प्रतिदिन 

मुझसे   
यूँ दूर जाता जा रहा है
जैसे 
साल का पहला दिन  
हर आते नए दिन के साथ 
दूर होता जाता है  

और ,
यूँ दूर होते -होते  
साल के आखिरी दिन 
वो मुझसे  
साल-भर दूर हो जायेगा 

और ,
फिर यूँ होगा, कि  
वो मुझे शायद  
पिछले गए 
साल के कलैंडर की तरह 
भूल जायेगा  !

ज़ोया***


मंगलवार, अगस्त 27, 2019

तू मुझे कैसे भूल जाता है !


तू मुझे कैसे भूल जाता है ,
भूलकर कैसे सकून पाता है !

याद आती नहीं तुझे मेरी 
फ़िक्र सताती नहीं तुझे मेरी 
हमने बातों में इक सदी गुज़ारी थी 
 वो सदी तू कैसे भूल जाता है !

तू मुझे  कैसे भूल जाता है !

नाम इतने दिए मुझे तूने  
नाम इतने दिए तुझे मैंने  
कभी कोई कहीं तो सुनता होगा 
सुन के कैसे तू सह पाता है !

तू मुझे  कैसे भूल जाता है !

सबसे प्यारा तू दोस्त था मेरा 
दर्द-आशना था, था राज़दाँ मेरा
शिक़वा कोई नहीं मुझे तुझसे 
पर बता रब्त कैसे वो टूट जाता है 

तू मुझे कैसे भूल जाता है !

ज़ोया 

शुक्रवार, अगस्त 23, 2019

हृदयी फूल पलाश का !


और फिर यूँ हुआ 
धीरे धीरे उतरने लगा 
उगते सूरज सा वो चटक लाल रंग ! 
जंगल की लाट सा था वो, और 
धीरे धीरे धूसर राख़ होने लगा !
ठंडी ऊसर राख !

देखते ही देखते वो राख 
शिराओं में पसरने लगी ,और 
दहकती नारंगी घुमावदार
चपल पंखुड़ियाँ मानो 
मरे सांप सी निस्तेजित हो गयीं  
प्राणरहित, रागरहित, बदरंग !

आखिर कब सह पाया है
स्नेही जीवंत किंशुक 
तुषार निठुर विराग का 
धीमे धीमे फिर बस युहीं 
क्षय होता गया 
हृदयी फूल पलाश का !

:-ज़ोया 





जंगल की लाट,किंशुक = पलाश के नाम 
धूसर= ग्रे color
ऊसर =बंजर ,Unproductive 
शिराओं= blood vessels  
तुषार=पाला,Blight 
क्षय= Decay  

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