सोमवार, जुलाई 26, 2010

फलक तक गयी तज़स्सुम में 'जोया'


वो इक मोड़ जहाँ हम 'हम' से मैं और तुम' हो गये
कुछ तो आगे बढ़ गई और कुछ वहीँ पे खड़ी हूं मैं

या तो मुझे सब कुछ चाहिए या चाहिए कुछ भी नही
खाली कासा लिए ' ऐ खुदा ' इसी जिद पे अड़ी हूं मैं


तू था तो ग़म था, ग़म था तो नज्मों-ग़ज़लों में दम था
अब तू नही तो क्या लिखूं,बस इसी सोच में पड़ी हूं मैं

मैं पूछ बैठी इक दिन अपनी इक नज़्म से ' तू कौन है ' ?
बोली तेरे आज से हो गुज़रती,कल की नाज़ुक कड़ी हूं मैं


वक़्त ठहर सा गया है जिसमे , ना बढ़ता है ना घटता है
सूइयाँ रास्ते नापती रहती हैं जिसमे, वैसी इक घड़ी हूं मैं

इक ही सवाल पूछते हैं सब ,' नज्मे दर्द कहाँ से लती हैं'
जल के कोयला हीरा हो जाये. , उसी आग में सड़ी हूं मैं

मेरे लिखने वाले में लियाकत नही के तरतीब से लिख सके
मेरी ग़ज़ल कहती है जिंदगी के तुज़र्बों की कच्ची लड़ी हूं मैं

सय्यारों में ढूंढा,रकासा ए फलक तक गयी तज़स्सुम में 'जोया'
अंजाम ए तआकुब से मुन्तशिर हो,फलक से कतरा-२ झड़ी हूं मैं
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कासा -- bowl ..or..bowl of begger
सूइयाँ - arms of watch
सय्यारों - planets
रकासा ए फलक - Venus***..the planet
तज़स्सुम - Khoj ..search
तआकुब - shikaar...or Talaash ...

2 टिप्‍पणियां:

kaushlendra ने कहा…

DARD JAB HAD SE GUJAR JAYEGAA, KASAM SE AAPKO AAPKAA VO MIL JAYEGAA.VENUS JI! YE DARD HAI JO YAATRAA KO ZAARI RAKHTAA HAI,VARNAA HAM SAB KABKE KHTM HO GAYE HOTE.

kaushalendra ने कहा…

Main aapki kavitaayen baar-baar padhataa hun.Har baar kavitaa men faili joya ko sametanaa padtaa hai.Yah aapki behtarin rachanaa hai,iske har harf men sirf do hi cheejen hain -aap aur aapkaa dard."jahaan ham 'ham' se 'main' aur 'tum' ho gaye"..."anjaam-e-ta-aakub se muntashir ho,falak se kataraa-kataraa jhadi hun"....ye panktiyaan sidhe dil men utar kr barf ban gain.