बुधवार, अगस्त 18, 2010

प्यास...



सारे बादल छान मारे.....ओंधे कर डाले
पर इक भी बूँद पानी की ना मिली मुझे
प्यास के मारे यूँ लग रहा था "मर गयी"
इधर उधर यहाँ वहां हर जगह भटकी मैं
पर इक भी बूँद....... ना नसीब हुई मुझे

दूर देखा .....ज़मीन पर कुछ घड़े पड़े थे
झट से ज़मीन पे आ गिरी ...आसमा से
बेसुध भागती- दौडती हुई घड़ों तक पहुंची

आह ! .....बस खाली ठीकरे ..............
सब घड़े तोड़ डाले इक इक कर के ......

पर जैसे नज़र दौडाई .............कुछ था
कुछ ही दुरी पे ..कुछ था ........पानी !!!
कड़ी धूप में तवे सी गर्म सड़क पे .पानी

फिर वही बेसुधी की दौड़ ................

पर वहां कुछ नही.....था बस ..मिराज़ !!

हताश हो घुटने टेक ज़मीन पे गिर पड़ी
सुखा गला चिपक गया... प्यास के मारे
साँसे धीरे -धीरे ........धीमी होती गयी
सूखे पपड़ी जमे होंठ .....कुछ बुदबुदाये
क्या.....नही मालुम........पर कुछ कहा
फिर पथराई सी आँखें ....बंद हो गयी
............फिर अचानक किसी ने आके
ज़ोर से झटका ..........जोर जोर से...
.....
ओह !.सुबहा कब हुई पता नही चला
बिस्तर से उठी ..... ...पलट के देखा
कुछ किरचें थी ...टूटे घड़ों-ठीकरों की
थोड़ी सी मिटटी ......सुखी सड़क की
कहीं-२ ....खाली बादल औन्धे पड़े थे
जल्दी से सब समेटा .......कागज़ में
किसी ने देखा ...तो क्या समझाऊंगी

कि..सपना आँख से बाहर आ गिरा ?
या ये समझाउंगी कि "इक प्यास है"
जो ...सपनो से निकल हकीकत तक
आ जाती है कम्बखत ...बार - बार
............
कोई न समझेंगे
ये सपनो और कागज़ पे ही भली है

2 टिप्‍पणियां:

इमरान अंसारी ने कहा…

bahut khub....vakai aap gulzaar sahab se bahut prarit hai....aapki rachnao me unki jhalak saaf dekhti hai....behtrin koshish.

kaushalendra ने कहा…

Prem ki devi itni hataash-niraash kyon hai? Yatraa aur talaash jaari rakhiye,tute thikaron ke paar nadiyaan bhi hain aur athaah samandar bhi.